श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 30: भगवान् कपिल द्वारा विपरीत कर्मों का वर्णन  »  श्लोक 7

 
श्लोक
सन्दह्यमानसर्वाङ्ग एषामुद्वहनाधिना ।
करोत्यविरतं मूढो दुरितानि दुराशय: ॥ ७ ॥
 
शब्दार्थ
सन्दह्यमान—जलते हुए; सर्व—सभी; अङ्ग:—उसके अंग; एषाम्—इन परिजनों के; उद्वहन—पालन के लिए; आधिना—चिन्ता से युक्त; करोति—करता है; अविरतम्—सदैव; मूढ:—मूर्ख; दुरितानि—पापकर्म; दुराशय:— दुर्बुद्धि ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि वह चिन्ता से सदैव जलता रहता है, तो भी ऐसा मूर्ख कभी न पूरी होने वाली आशाओं के लिए सभी प्रकार के अनिष्ट कृत्य करता है, जिससे वह अपने तथाकथित परिवार तथा समाज का भरण-पोषण कर सके।
 
तात्पर्य
 कहा गया है कि आज के समय में जब कलियुग इतना प्रबल है कि प्रत्येक व्यक्ति माया के परिवार की झूठी भेंट स्वीकार करके चिन्ताओं से पूर्ण रहता है। ऐसे में एक महान् साम्राज्य को चलाना उतना कठिन नहीं जितना कि एक छोटे परिवार का पालन करना। हमारा परिवार मायाजनित है, यह कृष्ण लोक के परिवार का विकृत प्रतिबिम्ब है। कृष्ण लोक में भी परिवार, मित्र, समाज, पिता, माता सब कुछ हैं, किन्तु वे नित्य हैं। यहाँ पर हमारे शरीर बदलते ही हमारे पारिवारिक सम्बन्ध बदल जाते हैं। कभी हम मनुष्यों के परिवार में होते हैं, तो कभी देवताओं के परिवार में और कभी कुत्तों-बिल्लियों
के परिवार में। परिवार, समाज तथा मित्रता क्षणिक हैं, अत: ये असत् कहलाते हैं। यह कहा जाता है कि जब तक हम इस असत्, क्षणभंगुर अस्थायी समाज तथा परिवार से बँधे रहते हैं तब तक हम चिन्ताओं से घिरे रहते हैं। भौतिकतावादी यह नहीं जानते कि इस संसार में परिवार, समाज तथा मित्रता छाया मात्र हैं और वे उनसे जुड़ जाते हैं। स्वाभाविक है कि उनके हृदय सदा तपते रहते हैं, किन्तु समस्त असुविधाओं के होने पर भी वे ऐसे मिथ्या परिवार बनाये रखने के लिए काम करते हैं, क्योंकि उन्हें कृष्ण के साथ वास्तविक पारिवारिक संगति का कुछ पता नहीं रहता।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥