श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
श्रीभगवानुवाच
कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये ।
स्त्रिया: प्रविष्ट उदरं पुंसो रेत:कणाश्रय: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; कर्मणा—कर्मफल के द्वारा; दैव-नेत्रेण—भगवान् की अध्यक्षता में; जन्तु:—जीव; देह—शरीर; उपपत्तये—प्राप्त करने के लिए; स्त्रिया:—स्त्री के; प्रविष्ट:—प्रवेश करता है; उदरम्— गर्भ में; पुंस:—पुरुष के; रेत:—वीर्य का; कण—सूक्ष्म भाग; आश्रय:—रहते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : परमेश्वर की अध्यक्षता में तथा अपने कर्मफल के अनुसार विशेष प्रकार का शरीर धारण करने के लिए जीव (आत्मा) को पुरुष के वीर्यकण के रूप में स्त्री के गर्भ में प्रवेश करना होता है।
 
तात्पर्य
 जैसाकि पिछले अध्याय में कहा जा चुका है, नाना प्रकार की नारकीय स्थितियों को भोगने के बाद जीव पुन: मनुष्य का शरीर प्राप्त करता है। इस अध्याय में उसी प्रसंग को आगे बढ़ाया गया है। किसी व्यक्ति को जिसने पहले नारकीय जीवन बिताया है, मनुष्य का स्वरूप देने के लिए, आत्मा को पहले पुरुष के वीर्य में स्थानान्तरित किया जाता है, जो उसका पिता बनने के लिए उपयुक्त हो। संभोग के समय पिता के वीर्य से यह आत्मा माता के गर्भ में स्थानान्तरित हो जाता है, जिससे विशेष प्रकार का शरीर उत्पन्न होता है। यह विधि समस्त प्राणियों पर लागू होती है, किन्तु यहाँ पर उस मनुष्य के लिए विशेष रूप से वर्णित है, जो अन्धतामिस्र में चला गया हो। वहाँ पर कष्ट भोगने के बाद, जब वह कुत्ता तथा शूकर जैसे अनेक शरीर धारण कर चुकता है, तो पुन: मनुष्य का स्वरूप प्राप्त करने के लिए उसे उसी प्रकार का शरीर धारण करने का अवसर दिया जाता है, जिसमें वह नरक में जा पड़ा था।

यह सब कुछ भगवान् की अध्यक्षता में होता है। प्रकृति शरीर प्रदान करती है, किन्तु परमात्मा के निर्देशन में। भगवद्गीता में कहा गया है कि जीव इस जगत में प्रकृति द्वारा निर्मित रथ पर चढक़र घूमता है। परम पुरुष, परमात्मा रूप में व्यष्टि आत्मा के साथ सदैव उपस्थित रहते हैं। वह प्रत्येक आत्मा को उसके कर्मफल के अनुसार शरीर प्रदान करने के लिए प्रकृति को निर्देश देता है, जिसे प्रकृति करती है। यहाँ पर रेत:कणाश्रय शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह बताता है कि मनुष्य के वीर्य से स्त्री के गर्भ में जीवन उत्पन्न नहीं होता, अपितु जीव या आत्मा वीर्यकण का आश्रय लेकर स्त्री के गर्भ में जाता है, तभी शरीर विकसित होता है। आत्मा की अनुपस्थिति में मात्र संभोग से, जीव के उत्पन्न होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। यह भौतिकतावादी सिद्धान्त लागू नहीं होता कि आत्मा नहीं है और शिशु का जन्म केवल शुक्राणु तथा रज के संयोग से होता हैं। यह सिद्धान्त मान्य नहीं है।

 
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