श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
आरभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोऽपि वेपित: ।
नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदर: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
आरभ्य—प्रारम्भ होने पर; सप्तमात् मासात्—सातवें महीने से; लब्ध-बोध:—चेतना प्राप्त; अपि—यद्यपि; वेपित:— हिलता डुलता; न—नहीं; एकत्र—एक स्थान पर; आस्ते—रहा आता है; सूति-वातै:—शिशु जन्म के लिए हवाओं (प्रसूति वायु) द्वारा; विष्ठा-भू:—क्रीड़ा; इव—सदृश; स-उदर:—उसी गर्भ से उत्पन्न ।.
 
अनुवाद
 
 इस प्रकार गर्भाधान के पश्चात् सातवें मास से चेतना विकसित होने पर यह शिशु उन हवाओं के द्वारा चलायमान रहता है, जो भ्रूण को प्रसव के कुछ सप्ताह पूर्व से दबाती रहती हैं। वह उसी पेट की गन्दगी से उत्पन्न कीड़ों के समान एक स्थान में नहीं रह सकता।
 
तात्पर्य
 सातवें मास के बाद शिशु शारीरिक वायु से हिलने-डुलने लगता है, एक ही स्थान पर नहीं रहा आता, क्योंकि प्रसव के पूर्व सारा योनि-तंत्र शिथिल पड़ जाता है। यहाँ पर कीड़ों को सोदर कहा गया है। सोदर का वास्तविक अर्थ है “एक ही माता से उत्पन्न।” चूँकि शिशु माता के गर्भ से उत्पन्न होता है और कीड़े भी उसी माँ के गर्भ के भीतर सडऩ से उत्पन्न होते हैं, अत: शिशु तथा कीड़े वास्तव में भाई-भाई हैं। हम मनुष्यों में भ्रातृत्व स्थापित करने के लिए उत्सुक रहते हैं, किन्तु हमें कीड़ों को भी अपना भाई मानना चाहिए, अन्य प्राणियों की तो बात ही और है। अत: हमें समस्त प्राणियों के प्रति चिन्तित रहना चाहिए।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥