श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
नाथमान ऋषिर्भीत: सप्तवध्रि: कृताञ्जलि: ।
स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पित: ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
नाथमान:—याचना करता हुआ; ऋषि:—जीव; भीत:—डरा हुआ; सप्त-वध्रि:—सात आवरणों से बँधा; कृत- अञ्जलि:—हाथ जोड़े; स्तुवीत—प्रार्थना करता है; तम्—भगवान् को; विक्लवया—विकल होकर; वाचा—शब्दों से; येन—जिसके द्वारा; उदरे—गर्भ में; अर्पित:—स्थापित किया गया था ।.
 
अनुवाद
 
 इस भयभीत अवस्था में, भौतिक अवयवों के सात आवरणों से बँधा हुआ जीव हाथ जोडक़र भगवान् से याचना करता है जिन्होंने उसे इस स्थिति में ला रखा है।
 
तात्पर्य
 कहा जाता है कि जब स्त्री को प्रसव पीड़ा से गुजरना पड़ता है, तो वह प्रतिज्ञा करती है कि अब वह फिर से गर्भ धारण नहीं करेगी और ऐसा कष्ट फिर नहीं उठावेगी। इसी तरह से जब किसी का अस्पताल में आपरेशन होता है, तो रोगी प्रतिज्ञा करता है कि अब वह ऐसा कार्य नहीं करेगा जिससे वह बीमार पड़े और उसे फिर आपरेशन कराना पड़े। या जब कोई व्यक्ति संकट में होता है, तो वह प्रतिज्ञा करता है कि वह पुन: ऐसी भूल नहीं करेगा जिससे संकट में पड़े। इसी तरह जब जीव नारकीय अवस्था को प्राप्त होता है, तो वह भगवान् से प्रार्थना करता है कि वह पुन: पापकर्म नहीं करेगा जिससे वह माँ के गर्भ में जाकर जन्म- मृत्यु के चक्र में पड़े। गर्भ के भीतर की नारकीय अवस्था में जीव पुन: जन्म लेने से भयभीत रहता है, किन्तु जब वह गर्भ से बाहर आ जाता है, जब वह अपनी पूरी जवानी में और स्वस्थ होता है, तो वह सब कुछ भूल जाता है और पुन:पुन: वही पाप करता है जिनके लिए उसे इस भयावह स्थिति में रखा गया था।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥