श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
यन्माययोरुगुणकर्मनिबन्धनेऽस्मिन्
सांसारिके पथि चरंस्तदभिश्रमेण ।
नष्टस्मृति: पुनरयं प्रवृणीत लोकं
युक्त्या कया महदनुग्रहमन्तरेण ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—भगवान् की; मायया—माया से; उरु-गुण—महान् गुणों से निकलने वाला; कर्म—कर्म; निबन्धने—बन्धों से; अस्मिन्—इस; सांसारिके—बारम्बार जन्म तथा मृत्यु के; पथि—रास्ते पर; चरन्—चलते हुए; तत्—उसका; अभिश्रमेण—अत्यधिक कष्ट के साथ; नष्ट—भ्रष्ट; स्मृति:—स्मरण शक्ति; पुन:—फिर; अयम्—यह जीव; प्रवृणीत—अनुभव कर सकता है; लोकम्—अपनी असली प्रकृति; युक्त्या कया—जिस किसी साधन से; महत्- अनुग्रहम्—भगवान् की कृपा; अन्तरेण—बिना ।.
 
अनुवाद
 
 जीव आगे प्रार्थना करता है : जीवात्मा प्रकृति के वशीभूत रहता है और जन्म तथा मरण का चक्र बनाये रखने के लिए कठिन श्रम करता रहता है। यह बद्ध जीवन भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध की विस्मृति के कारण है। अत: बिना भगवान् की कृपा के कोई भगवान् की दिव्य प्रेमा-भक्ति में पुन: किस प्रकार संलग्न हो सकता है?
 
तात्पर्य
 मायावादी चिन्तकों का कहना है कि मीमांसा द्वारा ज्ञान के अनुशीलन से मनुष्य भवबन्धन से मुक्त हो सकता है। किन्तु यहाँ पर यह कहा गया है कि मनुष्य ज्ञान से नहीं, अपितु भगवान् की कृपा से मुक्त होता है। कोई बद्धजीव मीमांसा द्वारा कितना ही शक्तिशाली ज्ञान क्यों न प्राप्त कर ले, उससे परम सत्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। कहा जाता है कि भगवान् की कृपा के बिना कोई उनको या उनके वास्तविक रूप, गुण तथा नाम को नहीं समझ सकता। जो भक्ति नहीं करते वे कई हजारों वर्षों तक चिन्तन करने के बाद भी परम सत्य के स्वभाव को समझने में असमर्थ रहते हैं।

मनुष्य परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करके केवल श्रीभगवान् की कृपा से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि चूँकि हम भगवान् की भौतिक शक्ति द्वारा आवृत हैं इसीलिए हमारी स्मृति नष्ट हो जाती है। यह तर्क किया जा सकता है कि भगवान् की परम इच्छा से हमें इस भौतिक शक्ति के अधीन क्यों रखा गया? इसकी व्याख्या भगवद्गीता में की गई है जहाँ भगवान् कहते हैं, “मैं हर एक के हृदय में आसीन हूँ और मेरे ही कारण मनुष्य भूलता है या ज्ञान में जीवित रहता है।” बद्धजीव की विस्मृति भी परमेश्वर के आदेश से होती है। जीव अपनी बची-खुची स्वतन्त्रता का दुरुपयोग प्रकृति पर अधिकार जताने की इच्छा के कारण करता है। स्वतन्त्रता का अर्थ है कि मनुष्य इसे ढंग से या बेढंग से इस्तेमाल कर सकता है। यह अचल नहीं है, सक्रिय है, फलत: स्वतन्त्रता का दुरुपयोग ही माया के वशीभूत होने का कारण है।

माया इतनी प्रबल है कि भगवान् कहते है; इसके प्रभाव को पार कर पाना दुष्कर है। किन्तु मनुष्य भगवान् की शरण में जाकर सहज ही ऐसा कर सकता है। मामेव ये प्रपद्यन्ते—जो कोई भी उनकी शरण में जाता है, वह प्रकृति के कठोर नियमों के प्रभाव को पार कर सकता है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जीव उनकी इच्छा से माया के वश में है और यदि कोई इस पाश से छूटना चाहता है, तो यह भगवान् की कृपा से ही सम्भव है। यहाँ पर माया के अधीन बद्धजीव के कर्मों की व्याख्या की गई है। प्रत्येक बद्धजीव माया के अधीन नाना प्रकार के कर्म में लगा हुआ है। हम इस संसार में देख सकते हैं कि जीव इतनी शक्ति से कर्म करता है कि इन्द्रियतृप्ति के लिए भौतिक सभ्यता की तथाकथित प्रगति में उसका आश्चर्यजनक योगदान है। किन्तु वास्तव में उसको अपना पद जानना चाहिए कि वह परमेश्वर का शाश्वत दास है। जब वह पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह जान जाता है कि भगवान् परम पूज्य हैं और जीव उनका शाश्वत दास है। बिना इस ज्ञान के वह भौतिक कार्यों में लगा रहता है। यह अज्ञान या अविद्या कहलाती है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥