श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
मासेन तु शिरो द्वाभ्यां बाह्वङ्‌घ्र्याद्यङ्गविग्रह: ।
नखलोमास्थिचर्माणि लिङ्गच्छिद्रोद्भवस्त्रिभि: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
मासेन—एक मास के भीतर; तु—तब; शिर:—सिर; द्वाभ्याम्—दो महीने में; बाहु—हाथ; अङ्घ्रि—पैर; आदि— इत्यादि; अङ्ग—शरीर के अवयव; विग्रह:—स्वरूप; नख—नाखून; लोम—रोएँ; अस्थि—हड्डियाँ; चर्माणि—तथा चमड़ी; लिङ्ग—शिश्न; छिद्र—छेद; उद्भव:—प्राकट्य; त्रिभि:—तीन मास में ।.
 
अनुवाद
 
 एक महीने के भीतर सिर बन जाता है और दो महीने के अन्त में हाथ, पाँव तथा अन्य अंग आकार पाते हैं। तीसरे मास के अन्त तक नाखून, अँगुलियाँ, अँगूठे, रोएँ, हड्डियाँ तथा चमड़ी प्रकट हो आती हैं और इसी तरह जननेन्द्रिय तथा आँखें, नथुने, कान, मुँह तथा गुदा जैसे छिद्र भी प्रकट होते हैं।
 
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥