श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गत: ।
योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गत: ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; तथा—उस तरह से; अस्य—इस मनुष्य का; भवेत्—हो सके; मोह:—मुग्धता, प्रेमान्धता; बन्ध:—बन्धन; च—तथा; अन्य-प्रसङ्गत:—अन्य किसी वस्तु के प्रति आसक्ति से; योषित्-सङ्गात्—स्त्रियों के प्रति आसक्ति से; यथा—जिस तरह; पुंस:—मनुष्य का; यथा—जिस तरह; तत्-सङ्गि—स्त्रियों के इच्छुक पुरुषों के; सङ्गत:—साथ से ।.
 
अनुवाद
 
 अन्य किसी वस्तु के प्रति आसक्ति से उत्पन्न मुग्धता तथा बन्धन उतने पूर्ण नहीं होते जितने कि किसी स्त्री के प्रति आसक्ति से या उन व्यक्तियों के साथ से जो स्त्रियों के कामी रहते हैं।
 
तात्पर्य
 स्त्रियों के प्रति आसक्ति इतनी दूषित होती है कि मनुष्य न केवल स्त्री की संगति से भौतिक जीवन के प्रति आसक्त हो जाता है, अपितु इन स्त्रियों के प्रति अत्यधिक आसक्त रहने वाले पुरुषों की संगति से भी हो जाता है। हमारे बद्ध जीवन के अनेक कारण हैं, किन्तु इनमें सबसे बड़ा कारण है स्त्रियों की संगति, जिसकी पुष्टि अगले श्लोकों में हुई है।

कलियुग में स्त्री-संग अत्यन्त प्रबल है। जीवन के पग-पग पर स्त्रियों से पाला पड़ता है। यदि किसी को कुछ खरीदना है, तो सारे विज्ञापन स्त्रियों के चित्रों से भरे रहते हैं। स्त्रियों के प्रति मनोवैज्ञानिक आकर्षण अत्यधिक होता है, अत: लोग आध्यात्मिक ज्ञान के प्रति अत्यन्त लापरवाह हैं। चूँकि वैदिक सभ्यता आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है, अत: स्त्रियों की संगति की व्यवस्था सतर्कतापूर्वक की गई है। चार सामाजिक विभागों (आश्रमों) में से प्रथम (ब्रह्मचर्य), तृतीय (वानप्रस्थ) तथा चतुर्थ आश्रम (संन्यास) में स्त्री संगति नितान्त वर्जित है। केवल गृहस्थाश्रम में सीमित प्रतिबन्धों के अन्तर्गत स्त्रियों से मिलने-जुलने की छूट प्राप्त है। दूसरे शब्दों में, स्त्री-संगति का आकर्षण ही बद्धजीवन का कारण है और जो भी इस बद्ध जीवन से मुक्त होना चाहता है उसे स्त्रियों की संगति से अपने को विलग कर लेना चाहिए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥