श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
प्रजापति: स्वां दुहितरं दृष्ट्वा तद्रूपधर्षित: ।
रोहिद्भूतां सोऽन्वधावद‍ृक्षरूपी हतत्रप: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
प्रजा-पति:—ब्रह्माजी ने; स्वाम्—अपनी; दुहितरम्—पुत्री को; दृष्ट्वा—देखकर; तत्-रूप—उसके लावण्य से; धर्षित:—मोहित; रोहित्-भूताम्—मृगी के रूप में; स:—वह; अन्वधावत्—दौड़ा; ऋक्ष-रूपी—मृग के रूप में; हत—विहीन; त्रप:—लज्जा ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा अपनी पुत्री को देखकर उसके रूप पर मोहित हो गये और जब उसने मृगी का रूप धारण कर लिया तो वे मृग रूप में निर्लज्जतापूर्वक उसका पीछा करने लगे।
 
तात्पर्य
 ब्रह्मा का अपनी पुत्री के रूप पर मोहित होना तथा भगवान् के मोहिनी रूप पर शिवजी का मोहित होना—ये ज्वलन्त उदाहरण हमें शिक्षा देते हैं कि ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवता तक स्त्री की सुन्दरता पर मुग्ध हो जाते हैं, तो सामान्य बद्धजीव की क्या बिसात है? अत: हर एक को सलाह दी जाती है कि वह अपनी सगी पुत्री, अपनी माता या अपनी बहन तक से मुक्त भाव से न मिले-जुले, क्योंकि इन्द्रियाँ इतनी प्रबल हैं कि मनुष्य प्रेमान्ध हो जाता है और इन्द्रियाँ पुत्री-माता या बहन का नाता नहीं देखतीं। अत: मदन-मोहन की सेवा में लगकर भक्तियोग के द्वारा इन्द्रियों को वश में करने का अभ्यास करना सर्वोत्तम होगा। भगवान् कृष्ण का नाम मदनमोहन है, क्योंकि वे कामदेव या कामवासना को वश में कर सकते हैं। केवल मदनमोहन की सेवा करने से मदन के आदेशों पर अकुंश लगाया जा सकता है अन्यथा इन्द्रियों को वश में करने के सारे प्रयास विफल होंगे।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥