श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
तत्सृष्टसृष्टसृष्टेषु को न्वखण्डितधी: पुमान् ।
ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—ब्रह्मा द्वारा; सृष्ट-सृष्ट-सृष्टेषु—समस्त उत्पन्न जीवों में से; क:—कौन; नु—निस्सन्देह; अखण्डित—विपथ न होने वाली; धी:—बुद्धि वाला; पुमान्—पुरुष; ऋषिम्—ऋषि; नारायणम्—नारायण; ऋते—के अतिरिक्त; योषित्- मय्या—स्त्री के रूप में; इह—यहाँ; मायया—माया के द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न समस्त जीवों—अर्थात् मनुष्य, देवता तथा पशु में से ऋषि नारायण के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसा नहीं है, जो स्त्री रूपी माया के आकर्षण के प्रति निश्चेष्ट हो।
 
तात्पर्य
 आदि जीव स्वयं ब्रह्मा हैं जिनसे मरीचि जैसे ऋषि उत्पन्न हुए, मरीचि से कश्यप मुनि तथा अन्य और कश्यप मुनि तथा मनुओं ने विभिन्न देवताओं तथा मनुष्यों को उत्पन्न किया। किन्तु इनमें से ऐसा कोई नहीं जो स्त्री रूपी माया के जादू से मोहित न होता हो। समग्र संसार में ब्रह्मा से लेकर एक क्षुद्र चींटी तक—सभी विषयी जीवन के प्रति आकर्षित होते हैं। इस भौतिक जगत का यह मूल सिद्धान्त है। अपनी पुत्री द्वारा ब्रह्मा का मोहित होना ज्वलन्त उदाहरण है कि स्त्री के प्रति कामासक्ति से कोई भी नहीं बच पाता। अत: माया की सबसे आश्चर्यजनक सृष्टि स्त्री है, जो बद्धजीव को बन्धन में रखती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥