श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 38

 
श्लोक
बलं मे पश्य मायाया: स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् ।
या करोति पदाक्रान्तान्भ्रूविजृम्भेण केवलम् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
बलम्—शक्ति; मे—मेरा; पश्य—देखो; मायाया:—माया का; स्त्री-मय्या:—स्त्री के रूप में; जयिन:—विजेता; दिशाम्—सभी दिशाओं का; या—जो; करोति—करती है; पद-आक्रान्तान्—उसके पीछे-पीछे; भ्रूवि—उसकी भौंह की; जृम्भेण—गति से; केवलम्—केवल ।.
 
अनुवाद
 
 तनिक स्त्री रूपी मेरी माया की अपार शक्ति को समझने का प्रयत्न तो करो, जो मात्र अपनी भौहों की गति से संसार के बड़े से बड़े विजेताओं को भी अपनी मुट्ठी में रखती है।
 
तात्पर्य
 विश्व के इतिहास में ऐसे अनेक दृष्टान्त प्राप्त हैं जहाँ एक महान् विजेता किसी क्लेओपात्रा के सौन्दर्य पर मुग्ध होता रहा है। मनुष्य को स्त्री की सम्मोहन शक्ति तथा उस शक्ति के प्रति मनुष्य के आकर्षण के अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है। आखिर यह किस स्रोतसे उत्पन्न हुई? वेदान्त-सूत्र के अनुसार हम जानते हैं कि प्रत्येक वस्तु भगवान् से उद्भूत है। उसमें कहा गया है—जन्माद्यस्य यत:—जिसका अर्थ है कि भगवान् या परम पुरुष, ब्रह्म या परम सत्य ही वह स्रोत है जहाँ से प्रत्येक वस्तु उद्भूत होती है। आध्यात्मिक जगत में भी ऐसी स्त्री की सम्मोहक शक्ति तथा ऐसे आकर्षण के प्रति मनुष्य का शिकार होना भगवान् में अवश्य पाए जाते होंगे और वे भगवान् की दिव्य लीलाओं में प्रकट होते होंगे।
भगवान् परम पुरुष हैं अर्थात् परम नर हैं। जिस प्रकार सामान्य नर में मादा के प्रति आकृष्ट होने की चाह रहती है, वही उत्कटता भगवान् में भी पाई जाती है। वे भी स्त्री के सुन्दर रूप द्वारा मुग्ध होते हैं। प्रश्न यह है कि यदि वे ऐसे स्त्री-आकर्षण द्वारा मुग्ध होते रहते हैं, तो क्या वे किसी भौतिक स्त्री द्वारा आकृष्ट होंगे? ऐसा सम्भव नहीं है। इस संसार के लोग भी स्त्री आकर्षण का परित्याग कर सकते हैं यदि वे परब्रह्म द्वारा आकृष्ट हों। हरिदास ठाकुर के साथ ऐसा ही हुआ। एक सुन्दर वेश्या ने अर्धरात्रि में उन्हें आकर्षित करना चाहा, किन्तु वे भक्ति में, भगवान् के दिव्य प्रेम में स्थित थे, अत: उसके द्वारा मोहित नहीं हुए। उल्टे उन्होंने अपनी दिव्य संगति से उस वेश्या को महान् भक्त बना दिया। अत: भौतिक आकर्षण परमेश्वर को आकृष्ट नहीं कर सकता। जब वे किसी स्त्री द्वारा आकृष्ट होते हैं, तो वे उस स्त्री को अपनी शक्ति से उत्पन्न करते हैं। वह स्त्री राधारानी है। गोस्वामियों ने बताया है कि राधा तो भगवान् की ह्लादिनी शक्ति का प्रकट रूप हैं। जब भगवान् दिव्य आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं, तो वे अपनी अन्तरंगा शक्ति से स्त्री उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार स्त्री-सौंदर्य के प्रति आकर्षण सहज (प्राकृतिक) है, क्योंकि यह आध्यात्मिक जगत में पाया जाता है। भौतिक जगत में वह विकृत होकर प्रतिबिम्बित होता है इसीलिए अनेक उन्माद होते हैं।

यदि कोई भौतिक सौन्दर्य के द्वारा आकृष्ट न होकर राधारानी तथा कृष्ण के सौन्दर्य द्वारा आकृष्ट होने का अभ्यास कर ले तो भगवद्गीता का यह कथन परम् दृष्ट्वा निवर्तते—सत्य सिद्ध होए। एक बार राधा तथा कृष्ण के दिव्य सौंदर्य से आकर्षित हो जाने पर, फिर कोई भौतिक सौन्दर्य के प्रति आकृष्ट नहीं होता। राधाकृष्ण पूजा का यही विशेष महत्त्व है। इसकी पुष्टि यामुनाचार्य ने की है। उनका कथन है, “चूँकि मैं राधाकृष्ण के सौन्दर्य से आकृष्ट हो चुका हूँ, अत: जब भी किसी स्त्री के प्रति आकर्षण होता है या किसी स्त्री के साथ प्रसंग का स्मरण हो आता है, तो मैं उस पर थूकता हूँ और मेरा मुख घृणा से भर जाता है।” जब हम मदनमोहन तथा कृष्ण एवं उनकी प्रेमिकाओं के सौन्दर्य द्वारा आकर्षित होते हैं और हमारे बद्धजीवन की शृंखलाएँ अर्थात् स्त्री का सौंदर्य हमें आकृष्ट नहीं करता।

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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥