श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक
सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु
योगस्य पारं परमारुरुक्षु: ।
मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो
वदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥ ३९ ॥
 
शब्दार्थ
सङ्गम्—संगति; न—नहीं; कुर्यात्—करे; प्रमदासु—स्त्रियों की; जातु—कभी भी; योगस्य—योग की; पारम्— पराकाष्ठा; परम्—सर्वोच्च; आरुरुक्षु:—पहुँचने की इच्छा करने वाला; मत्-सेवया—मेरी सेवा करके; प्रतिलब्ध— प्राप्त; आत्म-लाभ:—आत्म-साक्षात्कार; वदन्ति—कहते हैं; या:—जो स्त्रियाँ; निरय—नरक का; द्वारम्—द्वार; अस्य—आगे बढऩे वाले भक्त का ।.
 
अनुवाद
 
 जो योग की पराकाष्ठा को प्राप्त करना चाहता हो तथा जिसने मेरी सेवा करके आत्म-साक्षात्कार कर लिया हो उसे चाहिए कि वह कभी किसी आकर्षक स्त्री की संगति न करे, क्योंकि शास्त्रों में घोषणा की गई है कि प्रगतिशील के लिए ऐसी स्त्री नरक के द्वार तुल्य है।
 
तात्पर्य
 योग की पराकाष्ठा (इति) पूर्ण कृष्णभक्ति है। इसका समर्थन भगवद्गीता में इस प्रकार हुआ है : जो व्यक्ति भक्ति में रहकर सदैव कृष्ण का चिन्तन करता है, वह समस्त योगियों में सर्वोच्च है। यही नहीं, श्रीमद्भागवत के प्रथम स्कंध के द्वितीय अध्याय में भी कहा गया है कि जब कोई भगवान् की सेवा करके भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है, तो वह ईश्वर के विज्ञान तथा तत्त्वज्ञान को समझ सकता है।

यहाँ पर प्रतिलब्धात्मलाभ: शब्द आया है। आत्म का अर्थ ‘स्व’ या आत्मा है और लाभ का अर्थ ‘उपलब्धि’ है। सामान्यत: बद्धजीव अपनी आत्मा या स्व खो चुके हैं, किन्तु जो योगी हैं, वे आत्म का साक्षात्कार कर चुकते हैं। यहाँ आगाह किया गया है कि ऐसे स्वरूपसिद्ध व्यक्ति जो योग-सिद्धि की पराकाष्ठा तक पहुँचना चाहते हैं उन्हें युवा स्त्री की संगति नहीं करनी चाहिए। किन्तु वर्तमान युग में ऐसे अनेक धूर्त (पाखंडी) हैं, जो यह सलाह देते हैं कि जब तक काम-इन्द्रियाँ हैं तब तक मनुष्य जी भर कर स्त्री-भोग कर सकता है और साथ ही योगी बन सकता है। किसी भी मानक योगपद्धति में स्त्री-संगति स्वीकृत नहीं है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री-संगति नरक का द्वार है। वैदिक सभ्यता में स्त्री की संगति अत्यन्त सीमित होती है। चार आश्रमों में से तीन—ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी—में स्त्री की संगति वर्जित है, केवल गृहस्थों को स्त्री से निकट सम्पर्क की छूट रहती है और यह सम्बन्ध अच्छी सन्तान उत्पन्न करने तक ही सीमित है। किन्तु यदि कोई इस भौतिक संसार में बने रहना चाहता है, तो उसे निर्बाध स्त्री-संगति करनी चाहिए।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥