श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
योपयाति शनैर्माया योषिद्देवविनिर्मिता ।
तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणै: कूपमिवावृतम् ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
या—जो; उपयाति—निकट आती है; शनै:—धीरे-धीरे; माया—माया स्वरूपा; योषित्—स्त्री; देव—भगवान् द्वारा; विनिर्मिता—उत्पन्न; ताम्—उसको; ईक्षेत—मानना चाहिए; आत्मन:—आत्मा की; मृत्युम्—मृत्यु; तृणै:—घास से; कूपम्—कुआँ; इव—सदृश; आवृतम्—ढका हुआ ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् द्वारा उत्पन्न स्त्री माया स्वरूपा है और जो ऐसी माया की सेवाएँ स्वीकार करके उसकी संगति करता है उसे यह भलीभाँति समझ लेना चाहिए कि यह घास से ढके हुए अंधे कुएँ के समान उसकी मृत्यु का मार्ग है।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी बेकार पड़े कुएँ को घास-फूस से ढक दिया जाता है, अत: यदि कोई यात्री अनजाने उस रास्ते से निकलता है, तो उस कुएँ में गिर जाता है और उसकी मृत्यु निश्चित होती है। इसी प्रकार जब कोई किसी स्त्री की सेवा ग्रहण कर लेता है, तो संगति प्रारम्भ होती है, क्योंकि भगवान् ने स्त्री को पुरुष की सेवा के लिए उत्पन्न किया है। उसकी सेवा स्वीकार करने से मनुष्य पाश में बँध जाता है। यदि वह इतना बुद्धिमान है कि स्त्री को नरक का द्वार समझता है, तो वह मुक्त होकर उसकी संगति कर सकता है। इसकी मनाही तो उसके लिए है, जो दिव्य पद तक उठने की महत्त्वाकांक्षा रखता है। पचास वर्ष पूर्व तक हिन्दू समाज में ऐसी संगति वर्जित थी। पत्नी अपने पति से दिन में नहीं मिल सकती थी। यहाँ तक कि गृहस्थों के अलग रिहायशी मकान होते थे। रिहायशी मकानों के अन्त:पुर स्त्रियों के निमित्त होते थे और बाहर के कमरे पुरुषों के लिए। स्त्री द्वारा की जाने वाली सेवा भले ही मोहक प्रतीत हो, किन्तु ऐसी सेवा ग्रहण करते समय मनुष्य को सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि यह स्पष्ट कहा गया है कि स्त्री मृत्यु का द्वार है या कि आत्मविस्मृति है। वह आध्यात्मिक बोध के मार्ग को अवरुद्ध कर देती है।
 
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