श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक
यां मन्यते पतिं मोहान्मन्मायामृषभायतीम् ।
स्त्रीत्वं स्त्रीसङ्गत: प्राप्तो वित्तापत्यगृहप्रदम् ॥ ४१ ॥
 
शब्दार्थ
याम्—जिसको; मन्यते—वह सोचती है; पतिम्—अपना पति; मोहात्—मोहवश; मत्-मायाम्—मेरी माया; ऋषभ— पुरुष रूप में; आयतीम्—आती हुई; स्त्रीत्वम्—स्त्री बनने की दशा, स्त्रीत्व; स्त्री-सङ्गत:—किसी स्त्री की संगति से; प्राप्त:—प्राप्त; वित्त—सम्पत्ति; अपत्य—सन्तान; गृह—घर; प्रदम्—प्रदान करने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 पूर्व जीवन में स्त्री-आसक्ति के कारण जीव स्त्री का रूप प्राप्त करता है मूर्खतावश माया को अपना पति मानकर उसे ही सम्पत्ति, सन्तान, घर तथा अन्य भौतिक साज समान देने वाला समझता है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक से प्रतीत होता है कि स्त्री भी अपने पूर्वजन्म में पुरुष रहती है और अपनी पत्नी के प्रति आसक्ति के कारण उसे स्त्री शरीर प्राप्त हुआ रहता है। भगवद्गीता से इसकी पुष्टि होती है कि मरते समय मनुष्य जैसा सोचता है उसी के अनुसार उसे अगला जीवन प्राप्त होता है। यदि कोई अपनी स्त्री के प्रति अत्यधिक अनुरक्त है, तो यह स्वाभाविक है कि मृत्यु के समय वह अपनी पत्नी का चिन्तन करता है और अगले जन्म में उसे स्त्री का शरीर प्राप्त होता है। इसी प्रकार यदि कोई स्त्री अपनी मृत्यु के समय अपने पति का स्मरण करती है, तो उसे अगले जन्म में मनुष्य का शरीर प्राप्त होता है। फलत: हिन्दू शास्त्रों में स्त्री के सतीत्व तथा मनुष्य के प्रति उसकी भक्ति पर अत्यधिक बल दिया जाता है। अपने पति के प्रति आसक्ति के फलस्वरूप ही स्त्री अगले जीवन में मनुष्य शरीर प्राप्त कर सकती है, किन्तु स्त्री के प्रति अनुरक्ति से मनुष्य को नीचे गिरकर स्त्री का शरीर धारण करना होता है। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, हमें यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि स्थूल तथा सूक्ष्म दोनों प्रकार के शरीर वस्त्र तुल्य हैं—वे जीवात्मा के कमीज तथा कोट की तरह हैं। स्त्री या पुरुष होना शारीरिक वस्त्र का भेद है। आत्मा वास्तव में परमेश्वर की तटस्था शक्ति है। प्रत्येक जीव शक्ति होने के कारण मूलत: स्त्री होता है अर्थात् भोग्य है। पुरुष शरीर में भवबन्धन से छूटने के लिए अधिक अवसर मिलते हैं, जबकि स्त्री शरीर में कम अवसर होते हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि स्त्री के प्रति आसक्ति द्वारा मनुष्य शरीर का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा अगले जन्म में स्त्री शरीर धारण करना होगा। स्त्री सामान्यत: घर गृहस्थी, गहने, सामान तथा कपड़े की भूखी रहती है। जब उसका पति ये वस्तुएँ लाकर दे देता है, तो वह सन्तुष्ट हो जाती है। स्त्री तथा पुरुष का सम्बन्ध अत्यन्त जटिल है, किन्तु कहने का सार यह है कि जो आत्म-साक्षात्कार के दिव्य पद तक उठना चाहता है उसे स्त्री की संगति करते समय सावधान रहना चाहिए। किन्तु कृष्णभक्ति की अवस्था में संगति पर ऐसा प्रतिबन्ध शिथिल हो सकता है, क्योंकि तब पुरुष तथा स्त्री की आसक्ति एक दूसरे के प्रति न होकर कृष्ण के प्रति होती है। तब वे दोनों समान रूप से भव-बन्धन से बाहर निकलने तथा कृष्ण के धाम जाने के पात्र बन जाते हैं। जैसाकि भगवद्गीता में पुष्टि हुई है, जो भी गम्भीरतापूर्वक कृष्णभावनामृत अंगीकार करता है—चाहे वह निम्नतम योनि का हो, स्त्री हो या कि अल्पज्ञ श्रेणी का श्रमिक या वणिक हो—वह भगवान् के धाम जाता है और कृष्णलोक पहुँचता है। पुरुष को न तो स्त्री के प्रति और न स्त्री को पुरुष के प्रति आसक्त होना चाहिए। दोनों को भगवान् की सेवा में अनुरक्त होना चाहिए। तभी दोनों इस भव-बन्धन से छूट सकते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥