श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 31: जीवों की गतियों के विषय में भगवान् कपिल के उपदेश  »  श्लोक 8

 
श्लोक
उल्बेन संवृतस्तस्मिन्नन्त्रैश्च बहिरावृत: ।
आस्ते कृत्वा शिर: कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधर: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
उल्बेन—झिल्ली से; संवृत:—लिपटा हुआ; तस्मिन्—उस स्थान पर; अन्त्रै:—आँतों से; च—तथा; बहि:—बाहर; आवृत:—घिरा हुआ, ढका; आस्ते—लेटा रहता है; कृत्वा—रखा जाकर; शिर:—सिर; कुक्षौ—पेट की ओर; भुग्न—झुका हुआ; पृष्ठ—पीठ; शिर:-धर:—गर्दन ।.
 
अनुवाद
 
 झिल्ली से लिपटा और बाहर से आँतों द्वारा ढका (घिरा) हुआ शिशु उदर में एक ओर पड़ा रहता है। उसका सिर उसके पेट की ओर मुड़ा हुआ रहता है और उसकी कमर तथा गर्दन धनुषाकार में मुड़े रहते हैं।
 
तात्पर्य
 यदि किसी बड़े मनुष्य को उस अवस्था में रखा जाय जिसमें एक शिशु उदर के भीतर सभी प्रकार से फँसा हुआ रहता है, तो उसके लिए कुछ क्षण भी जीवित रहना दूभर हो जाय। दुर्भाग्यवश हमें ये सारे कष्ट याद नहीं रहते हैं और हम इस जीवन में प्रसन्न
रहने का प्रयत्न करते हैं। हम जन्म-मृत्यु के पाश से आत्मा को मुक्त करने की तनिक भी चिन्ता नहीं करते। यह हमारी सभ्यता का दुर्भाग्य है कि ये बातें ठीक से समझायी नहीं जातीं जिससे लोग संसार की नाजुक स्थिति को समझ सकें।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥