श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
कपिल उवाच
अथ यो गृहमेधीयान्धर्मानेवावसन्गृहे ।
काममर्थं च धर्मान्स्वान्दोग्धि भूय: पिपर्ति तान् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
कपिल: उवाच—भगवान् कपिल ने कहा; अथ—अब; य:—जो व्यक्ति; गृह-मेधीयान्—गृहस्थों के; धर्मान्— कर्तव्य; एव—निश्चय ही; आवसन्—रहते हुए; गृहे—घर में; कामम्—इन्द्रियतृप्ति; अर्थम्—आर्थिक विकास; च— तथा; धर्मान्—धार्मिक अनुष्ठान; स्वान्—अपने; दोग्धि—भोगता है; भूय:—पुन: पुन:; पिपर्ति—सम्पन्न करता है; तान्—उनको ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने कहा : गृहस्थ जीवन बिताने वाला व्यक्ति धार्मिक अनुष्ठान करते हुए भौतिक लाभ प्राप्त करता रहता है और इस तरह वह आर्थिक विकास तथा इन्द्रियतृप्ति की अपनी इच्छापूर्ति करता है। वह पुन: पुन: इसी तरह कार्य करता है।
 
तात्पर्य
 गृहस्थ दो प्रकार के होते हैं—गृहमेधी तथा गृहस्थ। गृहमेधी का जीवन-लक्ष्य इन्द्रियतृप्ति रहता है और गृहस्थ का आत्म-साक्षात्कार। यहाँ भगवान् गृहेमधी के सम्बन्ध में अथवा उस व्यक्ति के विषय में बोल रहे हैं, जो इस जगत में बना रहना चाहता है। उसका कार्य है कि आर्थिक विकास के लिए धार्मिक अनुष्ठान करके भौतिक लाभों का भोग करे और अन्तत: अपनी इन्द्रियों को तुष्ट करे। उसे इससे अधिक और कुछ नहीं चाहिए। ऐसा व्यक्ति धनी बनने तथा अच्छी तरह से रहने और खाने पीने के लिए जीवन भर कठोर श्रम करता है। वह किसी पुण्यकार्य के लिए कुछ दान देकर अगले जीवन में स्वर्गलोक को जा सकता है, किन्तु वह जन्म-मृत्यू के आवागमन को रोकना नहीं चाहता और न संसार के दुखों का अन्त देखना चाहता है। ऐसा व्यक्ति गृहमेधी कहलाता है।

गृहस्थ वह व्यक्ति है, जो अपने परिवार, पत्नी, बच्चों तथा कुटुम्बियों के साथ रहता है, किन्तु उनसे कोई लगाव नहीं रखता। वह साधु या संन्यासी न बनकर पारिवारिक जीवन बिताना पसन्द करता है, किन्तु उसका मुख्य उद्देश्य आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करना या कृष्णभावनामृत के पद तक पहुँचना रहता है। किन्तु यहाँ कपिलदेव गृहमेधी के विषय में बता रहे हैं जिनका लक्ष्य भौतिकतावादी सम्पन्न जीवन बिताना है और जिसे वे यज्ञ, दान तथा सद्ककर्म द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। वे अच्छे पदों पर आसीन होते हैं, अत: वे अपने पुण्यकर्मों की कमाई का उपयोग करते हैं और बारम्बार इन्द्रियतृप्ति के कार्यकलाप करते रहते हैं। प्रह्लाद महाराज ने कहा है—पुन: पुनश्चर्वितचर्वणानाम्—वे चबाये हुए को पुन: चबाना पसन्द करते हैं। समृद्ध होते हुए भी वे पुन: पुन: भौतिक यातनाएँ झेलते हैं, किन्तु ऐसे जीवन का परित्याग करना नहीं चाहते।

 
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