श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
अथ तं सर्वभूतानां हृत्पद्मेषु कृतालयम् ।
श्रुतानुभावं शरणं व्रज भावेन भामिनि ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
अथ—अत:; तम्—भगवान् को; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों के; हृत्-पद्मेषु—कमल हृदयों में; कृत-आलयम्— निवास करते हुए; श्रुत-अनुभावम्—जिनका यश आपने सुना; शरणम्—शरण में; व्रज—जाओ; भावेन—भक्ति द्वारा; भामिनि—हे माता ।.
 
अनुवाद
 
 अत: हे माता, आप प्रत्यक्ष भक्ति द्वारा जन-जन के हृदय में स्थित पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण ग्रहण करें।
 
तात्पर्य
 कृष्णभक्ति से भगवान् का प्रत्यक्ष सम्पर्क हो सकता है और भगवान् के साथ प्रेमी, परमात्मा, पुत्र, मित्र या स्वामी रूप में उनसे सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। मनुष्य अनेक प्रकार से परमेश्वर के साथ दिव्य प्रेम-सम्बन्ध स्थापित कर सकता है और यह भाव ही वास्तविक तादात्म्य है। किन्तु मायावादी चिन्तकों तथा वैष्णव चिन्तकों का तादात्म्य पृथक्- पृथक् होता है। ये दोनों ही परब्रह्म में लीन होना चाहते हैं, किन्तु वैष्णव अपनी सत्ता खोना नहीं चाहते। वे प्रेमी, जनक, मित्र या दास के रूप में अपनी सत्ता (पहचान) बनाये रखना चाहते हैं।
दिव्य जगत में दास तथा स्वामी एक हैं। यह परम पद है। यद्यपि उनमें दास तथा स्वामी का सम्बन्ध रहता है, किन्तु सेव्य तथा सेवक दोनों एक ही पद पर रहते हैं। यही तादात्म्य है। भगवान् कपिल ने अपनी माता को उपदेश दिया कि उन्हें किसी परोक्ष विधि की आवश्यकता नहीं है। वे पहले से प्रत्यक्ष विधि को प्राप्त हैं, क्योंकि परमेश्वर ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लिया है। वस्तुत: उन्हें और किसी उपदेश की आवश्यकता नहीं रह गई थी, क्योंकि वे पहले ही सिद्ध अवस्था में थीं। कपिलदेव ने उन्हें उसी अवस्था में बने रहने की सलाह दी। अत: उन्होंने अपनी माता को भामिनि कहकर सम्बोधित किया जो सूचित करता है कि वे पहले ही अपने पुत्र रूप में भगवान् का चिन्तन कर रही थीं। अत: कपिलदेव देवहूति को सीधे कृष्णभावनामृत में भक्ति करने की सलाह देते हैं, क्योंकि इस चेतना के बिना माया के पाश से मुक्त नहीं हुआ जा सकता।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥