श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 18

 
श्लोक
त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधस: ।
कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विष: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
त्रै-वर्गिका:—तीन उन्नतिकारी विधियों में रुचि रखने वाले; ते—वे; पुरुषा:—व्यक्ति; विमुखा:—रुचि न रखने वाले; हरि-मेधस:—भगवान् हरि की; कथायाम्—लीलाओं में; कथनीय—कीर्तन करने योग्य; उरु-विक्रमस्य—जिनका सर्वोत्तम विक्रम (शौर्य); मधु-द्विष:—मधु असुर के वध करने वाले ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे लोग त्रैवर्गिक कहलाते हैं, क्योंकि वे तीन उन्नतिकारी विधियों—पुरुषार्थों—में रुचि लेते हैं। वे उन भगवान् से विमुख हो जाते हैं, जो बद्धजीवों को विश्राम प्रदान करने वाले हैं। वे भगवान् की उन लीलाओं में कोई अभिरुचि नहीं दिखाते, जो भगवान् के दिव्य विक्रम के कारण श्रवण करने योग्य हैं।
 
तात्पर्य
 वैदिक विचारधारा के अनुसार चार उन्नतिकारी सिद्धान्त (पुरुषार्थ) हैं जिनके नाम हैं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। जो लोग भौतिक सुख में रुचि रखते हैं, वे नियत कर्म करते रहते हैं। वे तीन उन्नतिकारी विधियों—धर्म, अर्थ तथा काम में रुचि रखते हैं। अपनी आर्थिक स्थिति सुधार कर वे भौतिक जीवन का आनन्द उठा सकते हैं। फलत: भौतिकतावादी व्यक्ति केवल उन उन्नतिकारी विधियों में रुचि रखते हैं, जिन्हें त्रैवर्गिक कहा गया है। त्रै का अर्थ है तीन और वर्गिक का अर्थ है “उन्नतिकारी विधियाँ।” ऐसे पुरुष कभी भी भगवान् के प्रति आसक्त नहीं होते, अपितु वे उनके विरुद्ध रहते हैं।
यहाँ पर भगवान् को हरि-मेध: कहा गया है, जिसका अर्थ है “जन्म तथा मरण के चक्र से उद्धार करने वाला।” भौतिकतावादी व्यक्ति कभी भी भगवान् की आश्चर्यमयी लीलाओं को सुनने के प्रति कोई उत्सुकता नहीं दिखाते। वे इन्हें कपोलकल्पित कहानियाँ और भगवान् को भौतिक पुरुष मानते हैं। वे भक्ति या कृष्णचेतना में अग्रसर होने के योग्य नहीं होते। ऐसे लोग समाचारपत्रों में छपी कहानियों, उपन्यासों तथा काल्पनिक नाटकों में रुचि दिखाते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण के वास्तविक कार्यकलाप, जैसे कि भगवान् के कुरुक्षेत्र के कार्यकलाप अथवा पाण्डवों के कार्यकलाप, भगवान् की वृन्दावन या द्वारका की लीलाओं का वर्णन भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत् में हुआ है, जो कि भगवान् की लीलाओं के वर्णन से परिपूर्ण हैं। किन्तु भौतिकतावादी पुरुष संसार में अपने पद को ऊपर उठाने में लगे रहते हैं और भगवान् के ऐसे कार्यकलापों में कोई रुचि नहीं लेते। वे किसी महान् राजनीतिज्ञ या इस संसार के किसी परम धनवान व्यक्ति के कार्यकलापों में रुचि ले सकते हैं, किन्तु परमेश्वर के दिव्य कार्यकलापों में हरगिज नहीं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥