श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
नूनं दैवेन विहता ये चाच्युतकथासुधाम् ।
हित्वा श‍ृण्वन्त्यसद्गाथा: पुरीषमिव विड्भुज: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
नूनम्—निश्चय ही; दैवेन—भगवान् की आज्ञा से; विहता:—निन्दित; ये—जो; च—भी; अच्युत—अमोघ भगवान् की; कथा—कहानियाँ; सुधाम्—अमृत; हित्वा—त्याग कर; शृण्वन्ति—सुनते हैं; असत्-गाथा:—भौतिकतावादी पुरुषों की कहानियाँ; पुरीषम्—मल; इव—सदृश; विट्-भुज:—विष्ठाभोजी (सूकर) ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे व्यक्ति भगवान् के परम आदेशानुसार निन्दित होते हैं। चूँकि वे भगवान् के कार्यकलाप रूपी अमृत से विमुख रहते हैं, अत: उनकी तुलना विष्ठाभोजी सूकरों से की गई है। वे भगवान् के दिव्य कार्यकलापों को न सुनकर भौतिकतावादी पुरुषों की कुत्सित कथाएँ सुनते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रत्येक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के कार्यकलापों को सुनने का इच्छुक रहता है चाहे वह राजनीतिज्ञ हो, धनवान हो या उपन्योसों में वर्णित काल्पनिक पात्र हो। ऐसा तमाम व्यर्थ साहित्य, कहानियाँ तथा दर्शन की पुस्तकें हैं। भौतिकतावादी व्यक्ति ऐसा साहित्य पढऩे में अधिक रुचि लेते हैं, किन्तु जब उनके सामने भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण जैसे ज्ञानग्रंथ तथा विश्व के अन्य शास्त्र यथा बाइबिल या कुरान आते हैं, तो वे उनमें रुचि नहीं दिखाते। ऐसे व्यक्ति भगवान् के आदेशों (शास्त्रों) द्वारा उसी प्रकार से निन्दित होते हैं जिस तरह शूकर होता है। शूकर मल खाने में रुचि दिखाता है। यदि उसे घी अथवा दूध का बना कोई उत्तम पकवान दे दिया जाय तो वह उसे पसंद नहीं करता, वह दुर्गन्धमय विष्ठा (मल) को ही सबसे स्वादिष्ट समझता है। भौतिकतावादी मनुष्य इसीलिए निंद्य माने जाते हैं, क्योंकि वे दिव्य कार्यकलापों में रुचि न रखकर नारकीय कार्यों में रुचि प्रदर्शित करते हैं। भगवान् के कार्यकलापों का सन्देश अमृत है, इसके अतिरिक्त कोई भी जानकारी वास्तव में नारकीय है।
 
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