श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
दक्षिणेन पथार्यम्ण: पितृलोकं व्रजन्ति ते ।
प्रजामनु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृत: ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
दक्षिणेन—दक्षिणी; पथा—मार्ग से; अर्यम्ण:—सूर्य के; पितृ-लोकम्—पितृ लोक को; व्रजन्ति—जाते हैं; ते—वे; प्रजाम्—अपने परिवार; अनु—के साथ; प्रजायन्ते—जन्म लेते हैं; श्मशान—मरघट; अन्त—अन्त में; क्रिया—सकाम कर्म; कृत:—करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 ऐसे भौतिकतावादी व्यक्तियों को सूर्य के दक्षिण मार्ग से पितृलोक जाने दिया जाता है, किन्तु वे इस लोक में पुन: आकर अपने-अपने परिवारों में जन्म लेते हैं और जन्म से लेकर जीवन के अन्त तक पुन: उसी तरह कर्म करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (९.२१) में कहा गया है कि ऐसे व्यक्ति उच्च लोकों को जाते हैं। जब उनके जीवन भर के कर्म चुक जाते हैं, तो वे इस लोक में वापस आ जाते हैं। इस तरह वे ऊपर-नीचे आते-जाते रहते हैं। जो उच्च लोक को गये थे वे उसी परिवार में लौटते हैं जिनसे वे परम अनुरक्त थे; वे जन्म लेते हैं और पुन: उनके कर्म आजीवन चलते रहते हैं। जन्म से मृत्यु तक अनेक अनुष्ठानों का विधान है और ऐसे लोग इन अनुष्ठानों के प्रति अत्यधिक अनुरक्त रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥