श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
ज्ञानयोगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षण: ।
द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षण: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
ज्ञान-योग:—दार्शनिक शोध; च—तथा; मत्-निष्ठ:—मुझको लक्षित करके; नैर्गुण्य:—प्रकृति के गुणों से मुक्त; भक्ति—भक्ति; लक्षण:—नामक; द्वयो:—दोनों का; अपि—और; एक:—एक; एव—निश्चय ही; अर्थ:—अभिप्राय; भगवत्—भगवान्; शब्द—शब्द से; लक्षण:—बताने वाला ।.
 
अनुवाद
 
 दार्शनिक शोध का लक्ष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जानना है। इस ज्ञान को प्राप्त करके जब मनुष्य प्रकृति के गुणों से मुक्त हो जाता है, तो उसे भक्ति की अवस्था प्राप्त होती है। मनुष्य को चाहे, प्रत्यक्षत: भक्ति से हो या दार्शनिक शोध से हो, एक ही गन्तव्य की खोज करनी होती है और वह है भगवान्।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता में कहा गया है कि अनेकानेक जीवन पर्यन्त ज्ञानयोग का शोध करने के बाद अन्तत: मनुष्य उस बिन्दु पर पहुँचता है जहाँ उसे ज्ञात होता है कि भगवान् वासुदेव ही सब कुछ हैं, अत: वह उनकी शरण में जाता है। ऐसे ज्ञानयोग की शोध करने वाले विरले महापुरुष हैं। यदि ज्ञानयोग की खोज करके कोई भगवान् को प्राप्त नहीं होता तो समझिये कि सारा श्रम व्यर्थ हुआ। उसे तब तक ज्ञान की खोज करनी पड़ती है जब तक कि वह भगवान् की भक्ति को नहीं समझ लेता।

भगवान् के प्रत्यक्ष सम्पर्क में आने का अवसर भगवद्गीता में दिया हुआ है जहाँ इसका उल्लेख है कि जो लोग चिन्तन तथा योगाभ्यास जैसी अन्य विधियों का सहारा लेते हैं उन्हें कष्ट मिलता है। योगी या कुशल ज्ञानी अनेकानेक कठिनाइयों के बाद भगवान् तक पहुँच सकता है, किन्तु उसका मार्ग अत्यधिक कष्टप्रद होता है, जबकि भक्ति का मार्ग सबों के लिए सुगम है। मनुष्य को ज्ञानयोग का फल केवल भक्ति करने से प्राप्त हो सकता है और जब तक मनुष्य अपने चिन्तन द्वारा भगवान् तक नहीं पहुँच जाता तब तक उसकी सारी खोज केवल खिलवाड़ होती है। पटुज्ञानी का अन्तिम लक्ष्य निराकार ब्रह्म से तादात्म्य है, किन्तु ब्रह्म तो परम पुरुष का तेज है। भगवान् कृष्ण भगवद्गीता (१४.२७) में कहते हैं—ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम् अमृतस्याव्ययस्य च—मैं निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अविनाशी तथा परमानन्द हैं। भगवान् समस्त आनन्द के सागर हैं जिसमें ब्रह्मानन्द सम्मिलित है, अत: जिसकी भगवान् पर अविचल श्रद्धा है, वह पहले ही निराकार ब्रह्म तथा परमात्मा का साक्षात्कार कर चुकता है।

 
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