श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 37

 
श्लोक
प्रावोचं भक्तियोगस्य स्वरूपं ते चतुर्विधम् ।
कालस्य चाव्यक्तगतेर्योऽन्तर्धावति जन्तुषु ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
प्रावोचम्—कहा गया; भक्ति-योगस्य—भक्ति का; स्वरूपम्—पहचान, स्वरूप; ते—तुमसे; चतु:-विधम्—चार विभागों में; कालस्य—समय का; च—भी; अव्यक्त-गते:—जिसकी गति अलक्षित है; य:—जो; अन्तर्धावति—पीछा करता है; जन्तुषु—जीवों का ।.
 
अनुवाद
 
 हे माता, आपसे मैं भक्तियोग तथा चार विभिन्न आश्रमों में इसके स्वरूप की व्याख्या कर चुका हूँ। मैं आपको यह भी बता चुका कि शाश्वत काल किस तरह जीवों का पीछा कर रहा है यद्यपि यह उनसे अदृश्य रहता है।
 
तात्पर्य
 भक्तियोग वह प्रधान नदी है, जो परम सत्य स्वरूप सागर की ओर बह रही है और यहाँ पर वर्णित अन्य सारी विधियाँ उसकी सहायक नदियाँ हैं। भगवान् कपिल भक्तियोग की महत्ता का सार-संक्षेप दे रहे हैं। जैसा कि पहले बताया जा चुका है भक्तियोग चार विभागों में विभक्त है—तीन
तो प्रकृति के गुणों के रूप में हैं तथा चौथा अध्यात्म है, जो भौतिक गुणों से अछूता है। भक्ति-योग प्रकृति के गुणों के साथ मिलकर संसार का एक साधन है, जबकि कर्मफल की इच्छाओं से रहित तथा ज्ञानयोग के लिए प्रयासों से रहित भक्ति शुद्ध है, दिव्य भक्तिमय सेवा है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥