श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
न लोलुपायोपदिशेन्न गृहारूढचेतसे ।
नाभक्ताय च मे जातु न मद्भक्तद्विषामपि ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; लोलुपाय—लालची को; उपदिशेत्—उपदेश देवे; न—नहीं; गृह-आरूढ-चेतसे—गृहस्थ जीवन के प्रति आसक्त को; न—नहीं; अभक्ताय—अभक्त को; च—तथा; मे—मेरा; जातु—कभी; न—नहीं; मत्—मेरे; भक्त— भक्तगण; द्विषाम्—ईर्ष्यालुओं को; अपि—भी ।.
 
अनुवाद
 
 यह उपदेश न तो उन लोगों को दिया जाय जो अत्यन्त लालची हैं और गृहस्थ जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं, न ही अभक्तों और भक्तों एवं भगवान् के भक्तों तथा भगवान् के प्रति ईर्ष्या रखने वालों को दिया जाय।
 
तात्पर्य
 जो लोग सदैव अन्य जीवों को हानि पहुँचाने की योजनाएँ बनाते रहते हैं, वे कृष्णभावनामृत को समझने के अधिकारी नहीं हैं और वे भगवान् की दिव्य प्रेमा-भक्ति के प्रक्षेत्र में प्रविष्ट नहीं हो सकते। साथ ही, कुछ ऐसे स्वार्थी तथाकथित शिष्य होते हैं, जो अत्यन्त दिखावटी रूप से किसी और अंशा से गुरु के प्रति विनीत बने रहते हैं। वे भी नहीं जान पाते कि कृष्णभावनामृत अथवा भक्तियोग क्या है। ऐसे व्यक्ति, जो अन्य सम्प्रदाय में दीक्षित होने के कारण, भक्ति को भगवान् तक पहुँचने का एक-सा पद (स्थिति) नहीं समझते, वे भी कृष्णभक्ति को नहीं समझ सकते। हमारा अनुभव है कि कुछ अध्येता हमारे पास तो आते हैं, किन्तु किसी विशेष प्रकार का मताग्रह होने के कारण वे हमारा साथ छोडक़र वीराने में खो जाते हैं। वस्तुत: कृष्णभक्ति किसी सम्प्रदाय का धर्म नहीं है; यह तो परमेश्वर तथा उनके साथ अपने सम्बन्ध को जानने की शिक्षण विधि है। कोई भी इस आन्दोलन में बिना किसी भेदभाव के सम्मिलित हो सकता है। किन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अन्य प्रकार से अनुभव करते हैं। अत: यह श्रेयस्कर होगा कि ऐसे लोगों को कृष्णभक्ति के ज्ञान का उपदेश न दिया जाय।

सामान्यत: भौतिकतावादी व्यक्ति किसी नाम, यश तथा लाभ के पीछे लगे रहते हैं, अत: यदि कोई इन कारणों से कृष्णभक्ति ग्रहण करता है, तो वह इस दर्शन को कभी नहीं समझ सकता। ऐसे व्यक्ति धर्म को सामाजिक अलंकरण के रूप में ग्रहण करते हैं। विशेषत: कलियुग में वे किसी सांस्कृतिक संस्थान में केवल नाम कमाने के लिए प्रवेश करते हैं। ऐसे लोग भी कृष्णचेतना के दर्शन को नहीं समझ सकते। यदि कोई सांसारिक वस्तुओं के लिए लालची न भी हो, किन्तु यदि गृहस्थ जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्त है, तो वह भी कृष्णभक्ति को नहीं समझ सकता। ऊपर से ऐसे लोग भले ही लालची न लगें, किन्तु वे अपनी पत्नी, बच्चों तथा परिवार की उन्नति के प्रति अत्यधिक आसक्त रहते हैं। यदि कोई ऐसा व्यक्ति हो जो उपर्युक्त दोषों से कल्मषग्रस्त न हो तो भी यदि वह भगवान् की सेवा में रुचि नहीं रखता, या अभक्त है, तो वह कृष्णचेतना के दर्शन को नहीं समझ पाएगा।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥