श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
बहिर्जातविरागाय शान्तचित्ताय दीयताम् ।
निर्मत्सराय शुचये यस्याहं प्रेयसां प्रिय: ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
बहि:—बाहरी; जात-विरागाय—विरागी को, अनासक्त को; शान्त-चित्ताय—शान्त मन वाले को; दीयताम्—उपदेश दिया जाय; निर्मत्सराय—मत्सरशून्य, द्वेष न रखने वाले को; शुचये—पूर्णतया शुद्ध; यस्य—जिसका; अहम्—मैं; प्रेयसाम्—प्रियों में; प्रिय:—अत्यन्त प्रिय ।.
 
अनुवाद
 
 गुरु द्वारा यह उपदेश ऐसे व्यक्तियों को दिया जाय जो भगवान् को अन्य किसी भी वस्तु से अधिक प्रिय मानते हैं, जो किसी के प्रति द्वेष नहीं रखते, जो पूर्ण शुद्ध चित्त हैं और जिन्होंने कृष्णचेतना की परिधि के बाहर विराग उत्पन्न कर लिया है।
 
तात्पर्य
 प्रारम्भिक स्थिति में कोई भी भक्ति की उच्चतम अवस्था को प्राप्त नहीं होता। यहाँ भक्त का अर्थ उस व्यक्ति से है, जो भक्त बनने के लिए सुधारवादी विधियों को स्वीकार करने में हिचकता नहीं। भगवद्भक्त बनने के लिए मनुष्य को गुरु बनाना पड़ता है और उससे भक्ति विषयक प्रगति के विषय में जिज्ञासा करनी होती है। भक्ति में प्रगति करने के चौंसठ भक्ति-कार्य हैं जिनमें से कुछ हैं—भक्त की सेवा, जप विधि के अनुसार पवित्र नाम का जप, विग्रह-पूजन, श्रीमद्भागवत या भगवद्गीता को सिद्ध पुरुष से सुनना और ऐसे पवित्र स्थान में रहना जहाँ भक्ति में विघ्न न पड़े। जो इन पाँच प्रमुख कार्यों को करता है, वह भक्त है।

मनुष्य को चाहिए कि वह गुरु का यथेष्ठ सम्मान करे। उसे अपने गुरुभाइयों के प्रति द्वेष नहीं रखना चाहिए। अपितु यदि वह अधिक प्रबुद्ध है और कृष्णभक्ति में बढ़ा-चढ़ा है, तो उसे गुरु-तुल्य मानना चाहिए और ऐसे गुरुभाइयों को कृष्णभावनामृत में उन्नति करते देखकर प्रसन्न होना चाहिए। भक्त को चाहिए कि सामान्य-जनता को कृष्णभक्ति का उपदेश देने में अत्यन्त दयालु बने, क्योंकि माया के पाश से निकलने का एकमात्र समाधान यही है। यही वास्तविक लोक-कल्याण है, क्योंकि उन लोगों के प्रति दया दिखाने की यही विधि है जिन्हें इसकी आवश्यकता है। शुश्रूषाभिरताय शब्द उस व्यक्ति का सूचक है, जो गुरु की सेवा में श्रद्धापूर्वक निरत रहता है। गुरु की समस्त प्रकार से सेवा की जानी चाहिए और सारी सुविधाएँ प्रदान की जानी चाहिए जो भक्त ऐसा करता है, वह भी इन उपदेशों को ग्रहण करने के लिए पात्र है। बहिर्जात विरागाय शब्द उस व्यक्ति का सूचक है, जिसने आन्तरिक तथा बाह्य भौतिक कामनाओं से वैराग्य प्राप्त कर लिया है। वह कृष्णभक्ति से सम्बन्ध न रखने वाले कार्यकलापों से विरत तो है ही, साथ ही उसे आन्तरिक रूप से भौतिक जीवन से विमुख होना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को ईर्ष्यारहित होना चाहिए और सभी जीवों की—न केवल मनुष्यों की, अपितु उनके अतिरिक्त सारे जीवों की—कल्याण की कामना करनी चाहिए। शुचये का अर्थ है भीतर और बाहर से शुद्ध व्यक्ति। अन्दर और बाहर से शुद्ध बनने के लिए मनुष्य को भगवान् कृष्ण या विष्णु के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहिए।

दीयताम् शब्द बताता है कि कृष्णभक्ति का ज्ञान गुरु द्वारा दिया जाना चाहिए। गुरु को चाहिए कि अयोग्य शिष्य को स्वीकार न करे, स्वयं व्यावसायिक न बने और अर्थलाभ के लिए शिष्य न बनाए। प्रामाणिक गुरु को चाहिए कि वह उस व्यक्ति के प्रामाणिक गुणों को देखे जिसे वह दीक्षित करने जा रहा है। अयोग्य व्यक्ति दीक्षित न हो। गुरु अपने शिष्य को इस तरह प्रशिक्षित करे कि भविष्य में उसके जीवन का उद्देश्य एकमात्र भगवान् रहे।

इन दो श्लोकों में भक्त के गुणों की पूरी व्याख्या है। जिसने इन श्लोकों में वर्णित समस्त गुणों का विकास कर लिया है, वह पहले से भक्त-पद को प्राप्त है। यदि उसने इन सारे गुणों को विकसित नहीं किया है, तो उसे अब भी इन प्रतिबन्धों को पूरा करना होगा, जिससे वह कुशल भक्त बन सके।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥