श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 43
 
 
श्लोक
य इदं श‍ृणुयादम्ब श्रद्धया पुरुष: सकृत् ।
यो वाभिधत्ते मच्चित्त: स ह्येति पदवीं च मे ॥ ४३ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; इदम्—इसको; शृणुयात्—सुनेगा; अम्ब—हे माता; श्रद्धया—श्रद्धा से; पुरुष:—व्यक्ति; सकृत्—एक बार; य:—जो; वा—अथवा; अभिधत्ते—उच्चारण करता है; मत्-चित्त:—अपने मन को मुझ पर स्थित करके; स:—वह; हि—निश्चय ही; एति—प्राप्त करता है; पदवीम्—धाम को; च—तथा; मे—मेरा ।.
 
अनुवाद
 
 जो कोई श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक एक बार मेरा ध्यान करता है, मेरे विषय में सुनता तथा कीर्तन करता है, वह निश्चय ही भगवान् के धाम को वापस जाता है।
 
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कंध के अन्तर्गत “कर्म-बन्धन” नामक बत्तीसवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥