श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
ये स्वधर्मान्न दुह्यन्ति धीरा: कामार्थहेतवे ।
नि:सङ्गा न्यस्तकर्माण: प्रशान्ता: शुद्धचेतस: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
ये—जो; स्व-धर्मान्—अपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्य; न—नहीं; दुह्यन्ति—लाभ उठाते हैं; धीरा:—बुद्धिमान; काम—इन्द्रियतृप्ति; अर्थ—आर्थिक विकास; हेतवे—के लिए; नि:सङ्गा:—भौतिक आसक्ति से मुक्त; न्यस्त— परित्यक्त; कर्माण:—सकाम कर्म; प्रशान्ता:—सन्तुष्ट; शुद्ध-चेतस:—शुद्धीकृत चेतना का ।.
 
अनुवाद
 
 जो बुद्धिमान हैं और शुद्ध चेतना वाले हैं, वे कृष्णभक्ति में पूर्णतया सन्तुष्ट रहते हैं। वे प्रकृति के गुणों से मुक्त होकर वे इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म नहीं करते; अपितु वे अपने-अपने कर्मों में लगे रहते हैं और विधानानुसार कर्म करते हैं।
 
तात्पर्य
 इस प्रकार के पुरुष का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण अर्जुन है। अर्जुन क्षत्रिय था और उसका धर्म युद्ध करना था। सामान्यतया राजा अपने राज्य के विस्तार के लिए युद्ध करते हैं और इन्द्रियतृप्ति के लिए उस पर राज्य करते हैं। जहाँ तक अर्जुन का प्रश्न है, उसने अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए युद्ध करने से इनकार कर दिया। उसने कहा कि यद्यपि स्वजनों से युद्ध करके वह साम्राज्य प्राप्त कर सकता है, किन्तु वह उनसे लडऩा नहीं चाहता। किन्तु जब कृष्ण ने आदेश दिया और जब वह भगवद्गीता के उपदेशों से आश्वस्त हो गया कि उसका धर्म कृष्ण को प्रसन्न करना है, तो वह युद्ध करने लगा। इस प्रकार उसने अपनी इन्द्रियतुष्टि के लिए नहीं, अपितु भगवान् के संतोष के लिए युद्ध किया।

जो लोग अपना निर्धारित कर्म इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं, अपितु भगवान् को प्रसन्न करने के लिए करते हैं, वे नि:सङ्ग कहलाते हैं अर्थात् वे प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्त होते हैं। न्यस्त कर्माण: बताता है कि उनके कर्मों का फल भगवान् को प्रदान कर दिया जाता है। ऐसे लोग अपना-अपना कर्तव्य-निर्वाह करते प्रतीत होते हैं, किन्तु ऐसे कर्म निजी इन्द्रियतृप्ति के लिए न होकर भगवान् के लिए सम्पन्न किये जाते हैं। ऐसे भक्त प्रशान्ता: अर्थात् “परम सन्तुष्ट” कहलाते हैं। शुद्ध चेतस: का अर्थ है कृष्णभावनाभावित अर्थात् जिनकी चेतना शुद्ध हो चुकी है। चेतना शुद्ध न रहने पर मनुष्य अपने को ब्रह्माण्ड का स्वामी मानता है, किन्तु शुद्ध चेतना होने पर वह अपने को भगवान् का शाश्वत दास मानता है। अपने को भगवान् के शाश्वत दास के पद पर बिठाकर और निरन्तर उन्हीं के लिए काम करते हुए वह वास्तव में सन्तुष्ट हो जाता है। जब तक कोई निजी इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है तब तक वह चिन्ता से पूर्ण रहता है। सामान्य चेतना तथा कृष्णचेतना (भक्ति) में यही अन्तर है।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥