श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
निवृत्तिधर्मनिरता निर्ममा निरहङ्कृता: ।
स्वधर्माप्तेन सत्त्वेन परिशुद्धेन चेतसा ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
निवृत्ति-धर्म—विरक्ति के लिए धार्मिक कार्यों में; निरता:—निरन्तर लगे हुए; निर्ममा:—स्वामित्व के ज्ञान बिना; निरहङ्कृता:—अहंकाररहित; स्व-धर्म—अपने वृत्तिपरक कर्तव्य से; आप्तेन—सम्पन्न; सत्त्वेन—अच्छाई से; परिशुद्धेन—पूर्णत: शुद्ध; चेतसा—चेतना से ।.
 
अनुवाद
 
 अपने कर्तव्य-निर्वाह, विरक्तभाव से तथा स्वामित्व की भावना से अथवा अहंकार से रहित होकर काम करने से मनुष्य पूर्ण शुद्ध चेतना के द्वारा अपनी स्वाभाविक स्थिति में आसीन होकर और इस प्रकार से भौतिक कर्तव्यों को करते हुए सरलता के साथ ईश्वर के धाम में प्रविष्ट हो सकता है।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर निवृत्ति-धर्म-निरता: का अर्थ है “विरक्ति के लिए धार्मिक कार्यों को सम्पन्न करने में निरन्तर लगे रहना।” धार्मिक कार्य दो प्रकार के होते हैं। एक प्रवृत्ति-धर्म कहलाता है, जिसका अर्थ है उच्चतर लोकों तक जाने या आर्थिक सम्पन्नता के लिए गृहमेधियों द्वारा सम्पन्न धार्मिक कार्य, जिनका अन्तिम उद्देश्य इन्द्रियतृप्ति है। इस संसार में आया हुआ प्रत्येक व्यक्ति प्रभुता की भावना से युक्त रहता है। यह प्रवृत्ति कहलाती है। किन्तु विपरीत धार्मिक कार्य, जिसे निवृत्ति कहते हैं, परमेश्वर के लिए कर्म करना है। कृष्ण की भक्ति में संलग्न रहकर मनुष्य न तो किसी स्वामित्व का दावा कर सकता है, न ही उसे अहंकार रहता है कि वह ईश्वर या स्वामी है। वह अपने को सदैव दास समझता है। यह चेतना को शुद्ध करने की विधि है। केवल शुद्ध चेतना से ईश्वर के धाम में प्रविष्ट हुआ जा सकता है। भौतिकतावादी व्यक्ति उच्च पद पाने पर भौतिक जगत के भीतर किसी भी लोक में प्रविष्ट हो सकते हैं, किन्तु ये सब बारम्बार विनष्ट होते रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥