श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 32: कर्म-बन्धन  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक
द्विपरार्धावसाने य: प्रलयो ब्रह्मणस्तु ते ।
तावदध्यासते लोकं परस्य परचिन्तका: ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
द्वि-परार्ध—दो परार्धों के; अवसाने—अन्त में; य:—जो; प्रलय:—मृत्यु; ब्रह्मण:—भगवान् ब्रह्मा की; तु—लेकिन; ते—वे; तावत्—तब तक; अध्यासते—रहते हैं; लोकम्—लोक में; परस्य—परमेश्वर का; पर-चिन्तका:—भगवान् का चिन्तन करते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के हिरण्यगर्भ विस्तार के उपासक इस संसार में दो परार्धों के अन्त तक रहे आते हैं, जब ब्रह्मा की भी मृत्यु हो जाती है।
 
तात्पर्य
 एक प्रलय तो ब्रह्मा का दिन पूरा होने पर होता है और दूसरा ब्रह्मा की आयु समाप्त होने पर। ब्रह्मा की मृत्यु दो परार्ध पूरा होने पर होती है। उस समय सारा ब्रह्माण्ड विलीन हो जाता है। जो लोग भगवान् गर्भोदकशायी विष्णु के पूर्ण अंश हिरण्यगर्भ के पूजक हैं, वे सीधे वैकुण्ठ में भगवान् के पास नहीं पहुँचते। वे इसी ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा के जीवन काल तक सत्यलोक या अन्य किसी उच्च लोक में रहे आते हैं। तब वे ब्रह्मा के साथ-साथ वैकुण्ठ को जाते हैं।

परस्य परचिन्तका: का अर्थ है “सदैव भगवान् का चिन्तन करने वाले” या सदैव कृष्णभावनाभावित रहने वाले। जब हम कृष्ण का नाम लेते हैं, तो यह विष्णु तत्त्व की पूर्णकोटि को सूचित करता है। कृष्ण में तीन अवतार निहित हैं—महाविष्णु, गर्भोदकशायी विष्णु तथा क्षीरोदकशायी विष्णु तथा इसके साथ ही साथ सभी अवतारों का सम्मिलित रूप। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता में हुई है। रामादिमूर्तिषु कलानियमेन तिष्ठन्—भगवान् कृष्ण अपने अंशों सहित—यथा राम, नृसिंह, वामन, मधुसूदन, विष्णु तथा नारायण सहित सदैव विराजमान हैं। जो परस्य परचिन्तका: हैं, वे सीधे ईश्वर के धाम वैकुण्ठ लोक में प्रवेश करते हैं और यदि गर्भोदकशायी विष्णु के पूर्ण अंश के उपासक हैं, तो वे प्रलय तक इसी ब्रह्माण्ड में रहते हैं और तब वैकुण्ठ में जाते हैं।

 
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