श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
इति प्रदर्श्य भगवान्सतीं तामात्मनो गतिम् ।
स्वमात्रा ब्रह्मवादिन्या कपिलोऽनुमतो ययौ ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; इति—इस प्रकार; प्रदर्श्य—उपदेश देकर; भगवान्—भगवान्; सतीम्—आदरणीया को; ताम्—उस; आत्मन:—आत्म-साक्षात्कार का; गतिम्—पथ; स्व-मात्रा—अपनी माता से; ब्रह्म-वादिन्या— स्वरूपसिद्ध; कपिल:—भगवान् कपिल के; अनुमत:—आज्ञा ली; ययौ—चला गया ।.
 
अनुवाद
 
 श्री मैत्रेय ने कहा : अपनी ममतामयी माता को उपदेश देकर भगवान् कपिल ने उनसे आज्ञा माँगी और अपना लक्ष्य पूरा हो जाने के कारण उन्होंने अपना घर छोड़ दिया।
 
तात्पर्य
 कपिल के रूप में भगवान् के प्रकट होने का लक्ष्य सांख्य दर्शन के दिव्य ज्ञान को वितरित करना था, जो भक्ति से पूर्ण है। अपनी माता को—और अपनी माता के माध्यम से सारे संसार को—यह ज्ञान देकर उन्होंने अपनी माता से अनुमति माँगी और चले गये, क्योंकि फिर घर पर और अधिक रुकने की आवश्यकता न थी। स्पष्ट है कि उन्होंने आत्म-बोध के लिए गृहत्याग किया, यद्यपि स्वरूप-सिद्ध होने के कारण उन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से कुछ भी अनुभव करने के लिए शेष नहीं था। अत: भगवान् ने सामान्य व्यक्ति की भाँति आचरण
करते हुए यह उदाहरण प्रस्तुत किया जिससे अन्य लोग उनसे शिक्षा ग्रहण करें। निस्सन्देह वे अपनी माता के पास रह सकते थे, किन्तु उन्होंने बताया कि परिवार में उनके रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। सबसे अच्छा है ब्रह्मचारी, संन्यासी या वानप्रस्थ बनकर अकेले रहा जाय और जीवन भर कृष्णचेतना का अनुशीलन किया जाय। जो लोग अकेले नहीं रह सकते उन्हें गृहस्थ जीवन में अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ रहने की छूट है, जो इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं, अपितु कृष्णचेतना के अनुशीलन के लिए दी जाती है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥