श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
प्रजापते: कर्दमस्य तपोयोगविजृम्भितम् ।
स्वगार्हस्थ्यमनौपम्यं प्रार्थ्यं वैमानिकैरपि ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
प्रजा-पते:—प्रजापति, मानव जाति के जनक; कर्दमस्य—कर्दम मुनि की; तप:—तपस्या से; योग—योग से; विजृम्भितम्—विकसित, समृद्ध; स्व-गार्हस्थ्यम्—अपना घर तथा गृहस्थी; अनौपम्यम्—अद्वितीय; प्रार्थ्यम्—ईर्ष्या की वस्तु; वैमानिकै:—स्वर्ग के वासियों से; अपि—भी ।.
 
अनुवाद
 
 प्रजापति कर्दम का घर तथा उनकी गृहस्थी उनकी तपस्या तथा योग के बल पर इस प्रकार समृद्ध थी कि उनके ऐश्वर्य से आकाश में विमान से यात्रा करने वाले लोग भी ईर्ष्या करते थे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आया कथन कि कर्दम मुनि की गृहस्थी को देखकर बाह्य अन्तरिक्ष के पुरुष भी ईर्ष्या करते थे, वस्तुत: स्वर्ग के निवासियों के लिए है। उनके विमान आजकल के विमानों जैसे नहीं होते थे, जो केवल एक देश से दूसरे देश तक उड़ान भरते हैं, अपितु उनके विमान एक लोक से दूसरे तक यात्रा करने में समर्थ थे। श्रीमद्भागवत में ऐसे अनेक उल्लेख हैं जिनसे प्रकट है कि एक लोक से दूसरे लोक तक यात्रा करने की सुविधाएँ थीं और कौन जाने अब भी वे यात्रा कर रहे हों! हमारे विमानों तथा अन्तरिक्ष यानों की गति अत्यन्त सीमित है, किन्तु हम पहले ही देख चुके हैं कि कर्दम मुनि बाह्य अन्तरिक्ष में ऐसे विमान से यात्रा करते थे, जो नगर जैसा था और उन्होंने सभी लोकों की यात्रा की थी। वह न तो सामान्य विमान था और न वह यात्रा सामान्य अन्तरिक्ष यात्रा थी। चूँकि कर्दम मुनि अत्यन्त शक्तिशाली योगी थे, अत: उनके ऐश्वर्य से स्वर्ग के निवासी ईर्ष्या करते थे।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥