श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च ।
रत्नप्रदीपा आभान्ति ललना रत्नसंयुता: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
स्वच्छ—शुद्ध; स्फटिक—संगमरमर; कुड्येषु—दीवालों पर; महा-मारकतेषु—मूल्यवान मरकत मणि से अलंकृत; च—तथा; रत्न-प्रदीपा:—मणियों के दीपक; आभान्ति—चमकते है; ललना:—स्त्रियाँ; रत्न—आभूषणों से; संयुता:—अलंकृत ।.
 
अनुवाद
 
 घर की दीवालें उत्तमकोटि के संगमरमर की थीं और बहुमूल्य मणियों से अलंकृत थीं। वहाँ प्रकाश की आवश्यकता न थी, क्योंकि इन मणियों की किरणों से घर प्रकाशित था। घर की सभी स्त्रियाँ आभूषणों से अलंकृत थीं।
 
तात्पर्य
 इस कथन से पता चलता है कि गृहस्थी का ऐश्वर्य बहुमूल्य मणियों, हाथीदाँत, अच्छे संगमरमर तथा सोने और मणियों के बने साज-सामान से प्रदर्शित होता था। कपड़े भी सुनहरी जरी से युक्त थे। हर वस्तु का कुछ न कुछ मूल्य होता था। वहाँ आज के जैसा साज समान न था, जो मूल्यरहित प्लास्टिक या निम्न धातु का बना होता है। वैदिक सभ्यता का ढंग था कि घेरलू कामकाज में जो भी वस्तु प्रयुक्त होती थी वह मूल्यवान होती थी। आवश्यकता पडऩे पर तुरन्त इनका विनिमय किया जा सकता था। इस तरह यदि किसी का सामान टूट भी जाय तो उसका भी मूल्य होगा। आज भी भारतीय जन अपने घरों में इसी पद्धति को अपनाते हैं। वे धातु के बर्तन तथा स्वर्णभूषण या चाँदी के बने बर्तन और सोने की जरी वाले मूल्यवान रेशमी वस्त्र रखते हैं जिससे आवश्यकता पडऩे पर विनिमय में उन्हें कुछ धन मिल सके। उधार देने वालों तथा गृहस्थों के बीच ऐसा विनिमय चलता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥