श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
यत्र प्रविष्टमात्मानं विबुधानुचरा जगु: ।
वाप्यामुत्पलगन्धिन्यां कर्दमेनोपलालितम् ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
यत्र—जहाँ; प्रविष्टम्—प्रविष्ट हुए; आत्मानम्—अपने ही; विबुध-अनुचरा:—स्वर्ग के वासियों के संगी; जगु:— गाया; वाप्याम्—ताल में; उत्पल—कमल; गन्धिन्याम्—सुगंध से; कर्दमेन—कर्दम द्वारा; उपलालितम्—सावधानी से पाला गया ।.
 
अनुवाद
 
 जब देवहूति उस सुन्दर बगीचे में कमल फूलों से भरे हुए ताल में स्नान करने के लिए प्रवेश करतीं तो स्वर्गवासियों के संगी गर्न्धवगण कर्दम के महिमामय गृहस्थ जीवन का गुणगान करते। देवहूति के महान् पति कर्दम उन्हें सभी कालों में सुरक्षा प्रदान करते रहे।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में आदर्श पति-पत्नी का सम्बन्ध अत्यन्त सुन्दर ढंग से वर्णित है। कर्दम मुनि पति रूप में देवहूति को सुख के सारे प्रमुख साधन प्रदान करते थे, किन्तु वे अपनी पत्नी के प्रति तनिक भी आसक्त न थे। ज्योंही कपिल बड़े हो गये वैसे ही कर्दम ने सारे पारिवारिक सम्बन्ध तोड़ लिये। इसी प्रकार, देवहूति एक महान् राजा स्वायंभुव मनु की पुत्री थी, वह योग्य और सुन्दर थी, किन्तु वह अपने पति की सिद्धि पर पूर्णतया आश्रित थी। मनु के अनुसार, स्त्री को जीवन की किसी भी अवस्था में स्वतन्त्रता नहीं दी जानी चाहिए। बालपन में स्त्री को अपने माता-पिता के संरक्षण में, युवावस्था में पति के संरक्षण में और बुढ़ापे में अपने सयाने पुत्र के संरक्षण में रहना चाहिए। मनुसंहिता के इन सारे कथनों को देवहूति ने अपने जीवन में उतार लिया था—बालिका रूप में वह अपने पिता के आश्रित थी, बाद में ऐश्वर्यमान होते हुए भी अपने पति के तथा अन्त में अपने पुत्र कपिलदेव के आश्रय में थी।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥