श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
हित्वा तदीप्सिततममप्याखण्डलयोषिताम् ।
किञ्चिच्चकार वदनं पुत्रविश्लेषणातुरा ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
हित्वा—त्याग कर; तत्—वह घर; ईप्सित-तमम्—अभीष्ट; अपि—ही; आखण्डल-योषिताम्—इन्द्र की पत्नियों द्वारा; किञ्चित् चकार वदनम्—उसके मुख पर उदासी छायी थी; पुत्र-विश्लेषण—अपने पुत्र के वियोग से; आतुरा—दुखी ।.
 
अनुवाद
 
 यद्यपि उनकी स्थिति सभी प्रकार से अद्वितीय थी, किन्तु साध्वी देवहूति ने इतनी सम्पत्ति होते हुए भी, जिसकी ईर्ष्या स्वर्ग की सुन्दरियाँ भी करती थीं, अपने सारे सुख त्याग दिये। उन्हें यह शोक था कि उनका इतना महान् पुत्र उनसे विलग हो रहा है।
 
तात्पर्य
 देवहूति को अपने भौतिक सुख छोडऩे का दुख न था, किन्तु वे अपने पुत्र के वियोग से अत्यन्त शोकाकुल थीं। यहाँ यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि जब देवहूति को अपनी सारी सुख-सुविधाएँ त्यागने का कोई शोक न था, तो अपने पुत्र के जाने का इतना शोक क्यों था? वे अपने पुत्र के प्रति इतनी आसक्त क्यों थी? अगले श्लोक में इसका उत्तर दिया गया है। उनका पुत्र कपिल सामान्य पुत्र न था। वह भगवान् था। कोई व्यक्ति भौतिक आसक्ति को तभी त्याग सकता है जब उसकी आसक्ति परम पुरुष के प्रति हो। इसकी व्याख्या भगवद्गीता में हुई है—परं दृष्ट्वा निवर्तते। जब किसी में आध्यात्मिक जगत के प्रति रुचि होती है तभी वह भौतिक जीवन के प्रति उदासीन रहता है।
 
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