श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
स्वाङ्गं तपोयोगमयं मुक्तकेशं गताम्बरम् ।
दैवगुप्तं न बुबुधे वासुदेवप्रविष्टधी: ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
स्व-अङ्गम्—अपना शरीर; तप:—तपस्या; योग—योगाभ्यास; मयम्—पूर्णतया संलग्न; मुक्त—खुले हुए; केशम्— बाल; गत—अस्तव्यस्त; अम्बरम्—वस्त्र; दैव—भगवान् द्वारा; गुप्तम्—रक्षित; न—नहीं; बुबुधे—उसे पता था; वासुदेव—भगवान् में; प्रविष्ट—तल्लीन; धी:—विचार ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् के विचार में सदैव तल्लीन रहने के कारण उसे इसकी सुधि भी न रही कि उसके बाल बिखर गये हैं और उसके वस्त्र अस्त-व्यस्त हो गये हैं।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में दैवगुप्तम् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है “भगवान् द्वारा रक्षित।” एक बार भगवान् की शरण ग्रहण कर लेने पर वे ही भक्त के शरीर का पालन करते हैं और इसकी रक्षा के लिए किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रह जाती। श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कंध के द्वितीय अध्याय में
कहा गया है कि पूर्ण शरणागत व्यक्ति को अपने शरीर के पालन की परवाह नहीं रहती। परमेश्वर असंख्य प्रकार के जीवों का पालन करते हैं, अत: जो उनकी सेवा में संलग्न है, वह अरक्षित नहीं रह सकता। अत: स्वाभाविक है कि देवहूति को अपने शरीर की सुध-बुध न थी, उसकी रक्षा तो परम पुरुष कर रहे थे।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥