श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
स एव विश्वस्य भवान्विधत्ते
गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्य: ।
सर्गाद्यनीहोऽवितथाभिसन्धिर्
आत्मेश्वरोऽतर्क्यसहस्रशक्ति: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वही पुरुष; एव—निश्चय ही; विश्वस्य—ब्रह्माण्ड का; भवान्—आप; विधत्ते—करते हैं; गुण-प्रवाहेण—गुणों की अन्त:क्रिया से; विभक्त—विभाजित; वीर्य:—आपकी शक्तियाँ; सर्ग-आदि—सृष्टि इत्यादि; अनीह:—निष्क्रिय; अवितथ—सार्थक; अभिसन्धि:—दृढ़संकल्प; आत्म-ईश्वर:—समस्त जीवों के स्वामी; अतर्क्य—अकल्पनीय; सहस्र—हजारों; शक्ति:—शक्तियों से युक्त ।.
 
अनुवाद
 
 हे भगवान्, यद्यपि आपको निजी रूप से कुछ करना नहीं रहता, किन्तु आपने अपनी शक्तियाँ प्रकृति के गुणों की अन्त:क्रियाओं में वितरित कर दी हैं जिसके बल पर दृश्यजगत की उत्पत्ति, पालन तथा संहार होता है। हे भगवान्, आप दृढ़संकल्प हैं और समस्त जीवों के भगवान् हैं। आपने उन्हीं के लिए यह संसार रचा और यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आपकी शक्तियाँ अनेक प्रकार से कार्य करती हैं। यह हमारे लिए अकल्पनीय है।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में देवहूति ने कहा है कि यद्यपि परम सत्य को अपने आप कुछ भी नहीं करना होता तो भी उनकी विविध शक्तियाँ हैं। उसकी पुष्टि उपनिषदों में भी हुई है। उनसे न तो कोई बड़ा है, न ही कोई उनके समान है और सब कुछ उन्हीं की शक्ति से सम्पन्न होता है मानो प्रकृति द्वारा हो रहा हो। अत: इससे यह पता चलता है कि यद्यपि विभिन्न गुणों का भार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जैसे स्वरूपों को प्रदत्त है, जिन्हें भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियाँ मिली हुई हैं और भगवान् इन कार्यकलापों से सर्वथा पृथक् रहते हैं। देवहूति कह रही हैं “यद्यपि आप अपने से स्वयं कुछ भी नहीं कर रहे, किन्तु आपका संकल्प पूर्ण है। आपको अपनी इच्छापूर्ति के लिए अपने सिवा और किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है। आप अन्तत: परमात्मा तथा परम नियामक हैं। अत: आपकी इच्छा को कोई रोक नहीं सकता।” भगवान् किसी की भी योजना को रोक सकता है। कहा भी गया है “आपन चेती होइ नहिं प्रभु चेती तत्काल।” किन्तु जब भगवान् चाहते हैं, तो उनकी इच्छा अन्य किसी के अधीन नहीं रहती। वे पूर्ण हैं। हम अपनी इच्छापूर्ति के लिए उन्हीं पर आश्रित हैं, किन्तु हम यह नहीं कह सकते कि ईश्वर की इच्छाएँ भी किसी के अधीन हैं। यही उनकी अकल्पनीय शक्ति है। सामान्य जीवों के लिए जो अकल्पनीय है उसे वे सहज ही कर सकते हैं। वे असीम होते हुए भी वैदिक साहित्य जैसे प्रामाणिक शास्त्रों द्वारा जाने जाते हैं। जैसाकि कहा गया है शब्द मूलत्वात् उन्हें शब्द ब्रह्म या वैदिक साहित्य द्वारा जाना जा सकता है।
यह सृष्टि क्यों की जाती है? सब जीवों के श्रीभगवान् होने के कारण ही उन्होंने यह भौतिक जगत उन जीवों के लिए उत्पन्न किया जो इसका भोग करना चाहते हैं या प्रकृति पर प्रभुता जताना चाहते हैं। परमेश्वर रूप में वे उनकी विभिन्न इच्छाओं को पूरा करने की व्यवस्था करते हैं। वेदों में भी पुष्टि की गई है—एको बहूनां यो विदधाति कामान्—परमेश्वर अनेक जीवों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। विभिन्न प्रकार के जीवों की आवश्यकताओं का कोई अन्त नहीं है और केवल भगवान् ही उनका पालन करते तथा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति अपनी अकल्पनीय शक्ति द्वारा करते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥