श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 33: कपिल के कार्यकलाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
स त्वं भृतो मे जठरेण नाथ
कथं नु यस्योदर एतदासीत् ।
विश्वं युगान्ते वटपत्र एक:
शेते स्म माया-शिशुरङ्‌घ्रिपान: ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—वही पुरुष; त्वम्—तुमने; भृत:—जन्म लिया है; मे जठरेण—मेरे उदर से; नाथ—हे भगवान्; कथम्—कैसे; नु—तब; यस्य—जिसके; उदरे—पेट में; एतत्—यह; आसीत्—स्थित था; विश्वम्—ब्रह्माण्ड; युग-अन्ते—कल्प के अन्त में; वट-पत्रे—वट वृक्ष के पेड़ की पत्ती पर; एक:—अकेले; शेते स्म—सोते थे; माया—अकल्पनीय शक्तियों से युक्त; शिशु:—बालक; अङ्घ्रि—अँगूठा; पान:—चूसते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 आपने मेरे उदर से श्रीभगवान् के रूप में जन्म लिया है। हे भगवन्, यह उस परमेश्वर के लिए किस प्रकार सम्भव हो सका जिसके उदर में यह सारा दृश्य-जगत स्थित है? इसका उत्तर होगा कि ऐसा सम्भव है, क्योंकि कल्प के अन्त में आप वटवृक्ष की एक पत्ती पर लेट जाते हैं और एकछोटे से बालक की भाँति अपने चरणकमल के अँगूठे को चूसते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रलय के समय भगवान् कभी-कभी एक शिशु के रूप में प्रकट होते हैं, जो प्रलयकारी जल पर तैरती बरगद की पत्ती पर लेटा रहता है। अत: देवहूति कहती हैं, “मुझ जैसी सामान्य स्त्री के उदर में आपका लेटे रहना उतना आश्चर्यजनक नहीं है। आप तो बरगद की पत्ती पर लेट सकते हैं और शिशु की भाँति प्रलय-जल में तैरते रहते हैं। चूँकि यह अधिक आश्चर्यजनक नहीं है, अत: आप मेरे उदर में तो लेट ही सकते हैं। आप सिखाते हैं कि जो लोग इस संसार में सन्तान के इच्छुक होते हैं और जो विवाह करके सन्तान वाले परिवार का सुख उठाना चाहते हैं, उन्हें भगवान् के समान ही शिशु प्राप्त हो सकता है और सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि भगवान् स्वयं अपना अगूँठा चूसते हैं।”

चूँकि सारे ऋषि तथा भक्त अपनी सारी शक्ति तथा सारे कार्यकलाप भगवान् के चरणकमलों की सेवा में अर्पित कर देते हैं, अत: उनके चरणकमलों के अँगूठे में अवश्य ही कोई दिव्य आनन्द होता होगा। भगवान् अपना अँगूठा उस अमृत को चखने के लिए चूसते हैं जिसकी आकांक्षा भक्तगण सदा ही करते हैं। कभी-कभी स्वयं भगवान् को आश्चर्य होता है कि उनके भीतर कितना दिव्य आनन्द समाया है, अत: अपनी शक्ति का स्वाद चखने के उद्देश्य से कभी-कभी वे अपना स्वाद लेते हैं। भगवान् चैतन्य साक्षात् कृष्ण हैं, किन्तु वे एक भक्त के रूप में प्रकट होते हैं जिससे वे समस्त भक्तों में सर्वोपरि श्रीमती राधारानी द्वारा पान किये जानेवाले मधुर रस का स्वाद पा सकें।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥