श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
स एवमाराधितपादतीर्था-
दधीततत्त्वात्मविबोधमार्ग:
प्रणम्य पादौ परिवृत्य देव-
मिहागतोऽहं विरहातुरात्मा ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
स:—अतएव मैं; एवम्—इस प्रकार; आराधित—पूजित; पाद-तीर्थात्—भगवान् से; अधीत—अध्ययन किया हुआ; तत्त्व- आत्म—आत्मज्ञान; विबोध—ज्ञान, जानकारी; मार्ग:—पथ; प्रणम्य—प्रणाम करके; पादौ—उनके चरणकमलों पर; परिवृत्य—प्रदक्षिणा करके; देवम्—भगवान्; इह—इस स्थान पर; आगत:—पहुँचा; अहम्—मैं; विरह—वियोग; आतुर- आत्मा—आत्मा में दुखी, दुखित आत्मा से ।.
 
अनुवाद
 
 मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु भगवान् से आत्मज्ञान के मार्ग का अध्ययन किया है, अतएव उनकी प्रदक्षिणा करके मैं उनके विरह-शोक से पीडि़त होकर इस स्थान पर आया हूँ।
 
तात्पर्य
 श्री उद्धव का वास्तविक जीवन चतु: श्लोकी भागवत का प्रत्यक्ष प्रतीक है, जिसे भगवान् ने सर्वप्रथम ब्रह्माजी से कहा था। श्रीमद्भागवत के इन अत्यन्त महान् तथा महत्त्वपूर्ण श्लोकों को मायावादी चिन्तक, विशेष रूप से अलग करके, अपने अद्वैतवादी निर्विशेष मत का अनुमोदन करने के लिए इनका भिन्न तात्पर्य निकालते हैं। यहाँ पर ऐसे अनधिकृत चिन्तकों के लिए सही उत्तर दिया गया है। श्रीमद्भागवत के श्लोक शुद्ध आस्तिक विज्ञान हैं, जिन्हें भगवद्गीता के परास्नातक अध्येता समझ सकते हैं। अनधिकृत शुष्क चिन्तक तो भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों पर अपराधी हैं, क्योंकि वे लोग जनता को गुमराह करने के लिए भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत के तात्पर्यों को तोड़ते मरोड़ते हैं और इस तरह अन्धतामिस्र नामक नरक में जाने का सीधा मार्ग प्रशस्त करते हैं। भगवद्गीता (१६.२०) में पुष्टि की गई है कि ऐसे ईर्ष्यालु चिन्तक ज्ञानरहित होते हैं और जन्म-जन्मांतर निन्दा के पात्र बनते हैं। वे व्यर्थ ही श्रीपाद शंकराचार्य का आश्रय लेते हैं, जो स्वयं इतने उग्र न थे कि भगवान् कृष्ण के चरणकमलों पर अपराध करते। श्री चैतन्य महाप्रभु के अनुसार श्रीपाद शंकराचार्य ने किसी विशेष उद्देश्य से मायावाद दर्शन का प्रचार किया। ऐसा दर्शन आत्मा के अनस्तित्व वाले बौद्ध दर्शन को परास्त करने के लिए आवश्यक था। किन्तु इसका उद्देश्य शाश्वत स्वीकृति के लिए कभी नहीं था। यह एक आकस्मिता थी। इसीलिए शंकराचार्य ने भगवद्गीता पर लिखे अपने भाष्य में कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वीकार किया। चूँकि वे कृष्ण के महान् भक्त थे, अतएव उन्होंने श्रीमद्भागवत पर कोई टीका लिखने का दुस्साहस नहीं किया, क्योंकि यह भगवान् के चरणकमलों पर सीधा अपराध होता। किन्तु मायावाद दर्शन के नाम पर परवर्ती-चिन्तक बिना किसी प्रामाणिक उद्देश्य के चतु:श्लोकी भागवत पर अपनी टीका करते हैं।

अद्वैतवादी शुष्क चिन्तकों का श्रीमद्भागवत से कोई सरोकार नहीं है, क्योंकि इस विशेष वैदिक ग्रंथ के महान् प्रणेता ने स्वयं इसका निषेध उनके लिए किया है। श्रील व्यासदेव ने धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में लगे हुए व्यक्तियों को श्रीमद्भागवत के समझने का प्रयास करने के लिए निश्चित रूप से मना किया है, क्योंकि यह ग्रन्थ उनके लिए नहीं है। (भागवत१.१.२) श्रीमद्भागवत के महान् टीकाकार श्रीपाद श्रीधर स्वामी ने मोक्षवादियों या अद्वैतवादियों को श्रीमद्भागवत के विषय में कुछ भी सरोकार रखने से मना किया है। यह उनके लिए नहीं है। फिर भी ऐसे अनधिकृत व्यक्ति श्रीमद्भागवत को समझने का हठपूर्वक प्रयास करते हैं, जो दुस्साहस श्रीपाद शंकराचार्य तक नहीं कर सके। इस तरह वे भगवान् के चरणकमलों पर अपराध करते रहते हैं और अपना दुखी जीवन बनाये रखते हैं। यहाँ पर यह विशेष ध्यान देने की बात है कि उद्धव ने चतु:श्लोकी भागवत सीधे भगवान् से पढ़ी जिन्होंने इसे सर्वप्रथम ब्रह्माजी से कहा और इस बार परमां स्थितिं के रूप में आत्मज्ञान की अधिक गुह्य रूप से व्याख्या की। प्रेम के ऐसे आत्मज्ञान को सीख कर उद्धव भगवान् के विरह भावों से अत्यधिक दुखी हुए। जब तक उद्धव की अवस्था तक जागृत न हो लिया जाय तब तक श्रीमद्भागवत के इन चार अनिवार्य श्लोकों का असली अर्थ नहीं समझा जा सकता। उद्धव जैसी अविरत वियोग की यह अवस्था श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी प्रकट की थी। किसी को श्रीमद्भागवत के अर्थ को तोडऩे मरोडऩे के अनधिकृत कार्य में प्रवृत्त होकर अपराध के घातक मार्ग पर अपने को नहीं डालना चाहिए।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥