श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक
श्री शुक उवाच
इत्युद्धवादुपाकर्ण्य सुहृदां दु:सहं वधम् ।
ज्ञानेनाशमयत्क्षत्ता शोकमुत्पतितं बुध: ॥ २३ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्री शुकगोस्वामी ने कहा; इति—इस प्रकार; उद्धवात्—उद्धव से; उपाकर्ण्य—सुनकर; सुहृदाम्—मित्रों तथा सम्बन्धियों का; दु:सहम्—असह्य; वधम्—संहार; ज्ञानेन—दिव्य ज्ञान से; अशमयत्—स्वयं को सान्त्वना दी; क्षत्ता— विदुर ने; शोकम्—वियोग; उत्पतितम्—उत्पन्न हुआ; बुध:—विद्वान् ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : उद्धव से अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के संहार के विषय में सुनकर विद्वान् विदुर ने स्वयं के दिव्य ज्ञान के बल पर अपने असह्य शोक को प्रशमित किया।
 
तात्पर्य
 विदुर को बताया गया कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के परिणाम-स्वरूप उनके मित्रों तथा सम्बन्धियों के संहार के साथ-साथ यदुवंश का विनाश तथा भगवान् का प्रयाण हो चुका है। इन सबसे कुछ समय तक वे शोकाकुल हो उठे, किन्तु दिव्य ज्ञान में अत्यधिक बढ़े-चढ़े होने से वे अपने को उस ज्ञान द्वारा शान्त करने में पर्याप्त समर्थ थे। जैसाकि भगवद्गीता में कहा गया है, शारीरिक सम्बन्धों के साथ दीर्घकालीन संगति के फलस्वरूप मित्रों तथा सम्बन्धियों के संहार के कारण शोक का होना तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है, किन्तु मनुष्य को उच्चतर दिव्य ज्ञान के द्वारा ऐसे शोक को दमित करने की कला सीखनी चाहिए। उद्धव तथा विदुर के बीच कृष्ण विषयक वार्ता की शुरुआत संध्या समय हुई और अब उद्धव की संगति से विदुर का ज्ञान और भी बढ़ गया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥