श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
विदुर उवाच
ज्ञानं परं स्वात्मरह:प्रकाशं
यदाह योगेश्वर ईश्वरस्ते ।
वक्तुं भवान्नोऽर्हति यद्धि विष्णो-
र्भृत्या: स्वभृत्यार्थकृतश्चरन्ति ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
विदुर: उवाच—विदुर ने कहा; ज्ञानम्—ज्ञान; परम्—दिव्य; स्व-आत्म—आत्मा विषयक; रह:—रहस्य; प्रकाशम्—प्रबुद्धता; यत्—जो; आह—कहा; योग-ईश्वर:—समस्त योगों के स्वामी; ईश्वर:—भगवान् ने; ते—तुमसे; वक्तुम्—कहने के लिए; भवान्—आप; न:—मुझसे; अर्हति—योग्य हैं; यत्—क्योंकि; हि—कारण से; विष्णो:—भगवान् विष्णु के; भृत्या:—सेवक; स्व-भृत्य-अर्थ-कृत:—अपने सेवकों के हित के लिए; चरन्ति—विचरण करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 विदुर ने कहा : हे उद्धव, चूँकि भगवान् विष्णु के सेवक अन्यों की सेवा के लिए विचरण करते हैं, अत: यह उचित ही है कि आप उस आत्मज्ञान का वर्णन करें जिससे स्वयं भगवान् ने आपको प्रबुद्ध किया है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के सेवक वास्तव में समाज के सेवक होते हैं। मानव समाज को दिव्य ज्ञान में प्रबुद्ध बनाने के अतिरिक्त उनकी कोई रुचि नहीं होती। वे परमेश्वर से जीव के सम्बन्ध, उस दिव्य सम्बन्ध में कार्यकलाप तथा मानव जीवन के चरम उद्देश्य विषयक ज्ञान को प्रदान करने में रुचि लेते हैं। यही असली ज्ञान है, जो मानव कल्याण के असली लक्ष्य को प्राप्त करने में समाज की सहायता कर सकता है। खाने, सोने, संभोग करने तथा भयभीत रहने की शारीरिक आवश्यकताओं से सम्बन्धित ज्ञान उन्नति की विविध शाखाओं में रूपान्तरित होकर भी नश्वर होता है। जीव भौतिक शरीर नहीं, अपितु परम पुरुष का नित्य अंश है, अत: उसके आत्मज्ञान को पुनर्जागरित करना आवश्यक है। इस ज्ञान के बिना मानव-जीवन उलझन में पड़ जाता है। भगवान् विष्णु के सेवकों को यह उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य सौंपा गया है, अत: वे पृथ्वी पर तथा ब्रह्माण्ड के अन्य लोकों में विचरण करते हैं। इसप्रकार उद्धव को सीधे भगवान् से जो ज्ञान प्राप्त हुआ था वह मानव समाज में वितरण करने के योग्य है, विशेष रूप से विदुर जैसे पुरुषों में जो भगवद्भक्ति में अत्यधिक बढ़े-चढ़े हैं।

असली दिव्य ज्ञान भगवान् से उद्धव, उद्धव से विदुर और ऐसे ही आगे शिष्य-परम्परा द्वारा आगे- आगे उतरता जाता है। ऐसे परम दिव्य ज्ञान को उस अधूरी चिन्तन विधि से प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं जैसाकि लौकिक झगड़ालू तथाकथित विद्वान् करते हैं। विदुर उद्धव से उस गुह्य ज्ञान को जानने के लिए उत्सुक थे, जो परमां स्थितिम् कहलाता है, जिसमें भगवान् अपनी दिव्य लीलाओं द्वारा जाने जाते हैं। यद्यपि विदुर उद्धव से बड़े थे, किन्तु आध्यात्मिक सम्बन्ध में वे उद्धव का सेवक बनने को उत्सुक थे। दिव्य शिष्य-परम्परा का यह सूत्र चैतन्य महाप्रभु ने भी सिखाया है। श्री चैतन्य महाप्रभु सलाह देते हैं कि मनुष्य को किसी से भी, चाहे ब्राह्मण हो या शूद्र, गृहस्थ हो या संन्यासी, दिव्य ज्ञान ग्रहण करना चाहिए बशर्ते कि वह व्यक्ति कृष्ण-विज्ञान में यथार्थ रूप में पटु हो। वस्तुत:, जो व्यक्ति कृष्ण-विज्ञान जानता है, वही प्रामाणिक गुरु है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥