श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक
उद्धव उवाच
ननु ते तत्त्वसंराध्य ऋषि: कौषारवोऽन्तिके ।
साक्षाद्भगवतादिष्टो मर्त्यलोकं जिहासता ॥ २६ ॥
 
शब्दार्थ
उद्धव: उवाच—उद्धव ने कहा; ननु—लेकिन; ते—तुम्हारा; तत्त्व-संराध्य:—दिव्य ज्ञान को ग्रहण करने के लिए पूजनीय; ऋषि:—विद्वान्; कौषारव:—कौषारु पुत्र (मैत्रेय) को; अन्तिके—निकट; साक्षात्—प्रत्यक्ष; भगवता—भगवान् द्वारा; आदिष्ट:—आदेश दिया गया; मर्त्य-लोकम्—मर्त्यलोक को; जिहासता—छोड़ते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 श्री उद्धव ने कहा : आप महान् विद्वान ऋषि मैत्रेय से शिक्षा ले सकते हैं, जो पास ही में हैं और जो दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए पूजनीय हैं। जब भगवान् इस मर्त्यलोक को छोडऩे वाले थे तब उन्होंने मैत्रेय को प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा दी थी।
 
तात्पर्य
 कोई भले ही दिव्य विज्ञान में पारंगत क्यों न हो, उसे मर्यादा-व्यतिक्रम अर्थात् अपने से उच्च पुरुष की धृष्टता-पूर्वक अवमानना के अपराध के विषय में सतर्क रहना चाहिए। शास्त्रों के आदेशानुसार मनुष्य को मर्यादा-व्यतिक्रम नियम का उल्लंघन करने के प्रति अत्यन्त सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से उसकी आयु, उसका ऐश्वर्य, यश तथा पुण्य और सारे जगत के शुभाशीषों का विनाश होता है। दिव्य ज्ञान में पारंगत होने के लिए आध्यात्मिक विज्ञान की तकनीकों के प्रति जानकारी होना आवश्यक है। दिव्य ज्ञान की इन सारी बारीकियों से भलीभाँति परिचित होने के कारण उद्धव ने विदुर को सलाह दी कि दिव्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए वे मैत्रेय ऋषि के पास जाँए। विदुर उद्धव को अपना गुरु मानना चाहते थे, किन्तु उद्धव ने यह पद स्वीकार नहीं किया, क्योंकि विदुर उद्धव के पिता जितनी उम्र के थे, अतएव उद्धव उन्हें शिष्य रूप में स्वीकार नहीं कर सकते थे, विशेष रूप से जब मैत्रेय पास में ही उपस्थित थे। नियम यह है कि अपने से बड़े पुरुष की उपस्थिति में उपदेश देने के लिए किसी को उत्सुक नहीं होना चाहिए चाहे कोई कितना ही दक्ष तथा निष्णात क्यों न हो। इसलिए उद्धव ने विदुर-जैसे वयोवृद्ध व्यक्ति को एक अन्य वयोवृद्ध व्यक्ति मैत्रेय के पास भेजने का निर्णय लिया। वे भी निष्णात थे, क्योंकि भगवान् ने मर्त्यलोक से प्रयाण करते समय उन्हें भी स्वयं उपदेश दिया था। चूँकि उद्धव तथा मैत्रेय दोनों ही को सीधे भगवान् ने उपदेश दिया था, अतएव दोनों को विदुर का या अन्य किसी का गुरु बनने का अधिकार था। किन्तु वयोवृद्ध होने के कारण मैत्रेय को विदुर का गुरु बनने का पहला अधिकार था, क्योंकि विदुर आयु में उद्धव से काफी बड़े थे। किसी मनुष्य को लाभ तथा यश के लिए सस्ता आध्यात्मिक गुरु बनने के लिए उत्सुक नहीं होना चाहिए, अपितु केवल भगवान् की सेवा के निमित्त ही गुरु बनना चाहिए। भगवान् कभी भी मर्यादा-व्यतिक्रम की धृष्टता को सहन नहीं करते। मनुष्य को चाहिए कि अपने निजी लाभ तथा यश के लिए वयोवृद्ध गुरुओं को प्राप्य सम्मान में ऊपर-चढ़ी न करे। छद्म गुरु के लिए ढिठाई करना आध्यात्मिक साक्षात्कार में प्रगति के लिए अत्यन्त घातक है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥