श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक
राजोवाच
निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-
ष्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्य: ।
स तु कथमवशिष्ट उद्धवो यद्धरि-
रपि तत्यज आकृतिं त्र्यधीश: ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
राजा उवाच—राजा ने पूछा; निधनम्—विनाश; उपगतेषु—हो जाने पर; वृष्णि—वृष्णिवंश; भोजेषु—भोजवंश का; अधिरथ— महान् सेनानायक; यूथ-प—मुख्य सेनानायक; यूथ-पेषु—उनके बीच; मुख्य:—प्रमुख; स:—वह; तु—केवल; कथम्—कैसे; अवशिष्ट:—बचा रहा; उद्धव:—उद्धव; यत्—जबकि; हरि:—भगवान् ने; अपि—भी; तत्यजे—समाप्त किया; आकृतिम्— सम्पूर्ण लीलाएँ; त्रि-अधीश:—तीनों लोकों के स्वामी ।.
 
अनुवाद
 
 राजा ने पूछा : तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण की लीलाओं के अन्त में तथा उन वृष्णि एवं भोज वंशों के सदस्यों के अन्तर्धान होने पर, जो महान् सेनानायकों में सर्वश्रेष्ठ थे, अकेले उद्धव क्यों बचे रहे?
 
तात्पर्य
 श्री जीव गोस्वामी के अनुसार निधनम् का अर्थ है भगवान् का दिव्य धाम। नि का अर्थ है सर्वोच्च तथा धनम् का अर्थ हैं ऐश्वर्य। चूँकि भगवान् का धाम दिव्य ऐश्वर्य की सर्वोच्च अभिव्यक्ति है, अतएव उनके धाम को निधनम् कहा जा सकता है। व्याकरणिक स्पष्टीकरण के अतिरिक्त निधनम् शब्द का असली उद्देश्य यह सूचित करना है कि वृष्णि तथा भोज कुलों के सारे सदस्य भगवान् के प्रत्यक्ष संगी थे और भगवान् की लीलाओं की समाप्ति पर उन संगियों को दिव्यधाम में उनके अपने- अपने पदों पर भेज दिया गया था।

श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने आकृतिम् शब्द का अर्थ लीलाओं के रूप में किया है। आ का अर्थ है पूर्ण और कृतिम् का अर्थ दिव्य लीलाएँ है। चूँकि भगवान् अपने दिव्य शरीर से अभिन्न हैं, अतएव उनके शरीर के बदलने या त्यागने का प्रश्न ही नहीं है। भौतिक जगत के रीति-रिवाजों और नियमों के अनुसार कर्म करने के लिए भगवान् जन्म धारण करते या शरीर-त्याग करते हैं, किन्तु भगवान् के शुद्ध भक्त वास्तविकता से सुपरिचित होते हैं। इसलिए श्रीमद्भागवत के गम्भीर अध्येताओं के लिए आवश्यक है कि वे जीव गोस्वामी तथा विश्वनाथ चक्रवर्ती जैसे महान् आचार्यों की टीका टिप्पणियों का अनुसरण करें। अन्य लोग, जो कि भगवद्भक्त नहीं हैं, उनके लिए ऐसे आचार्यों की टीकाएँ एवं व्याख्याएँ व्याकरणिक वाग्जाल प्रतीत हो सकती हैं, किन्तु शिष्य-परम्परा का अनुसरण करने वाले छात्रों के लिए महान् आचार्यों की व्याख्याएँ अत्यन्त उपयुक्त हैं।

उपगतेषु शब्द भी महत्त्वपूर्ण है। वृष्णि तथा भोज कुलों के सारे सदस्य सीधे भगवान् के धाम पहुँच गये। अन्य भक्तगण भगवद्धाम सीधे नहीं पहुँचते, किन्तु भगवान् के शुद्ध संगियों को भौतिक जगत के किसी भी लोक के ऐश्वर्य के प्रति कोई आकर्षण नहीं होता। कभी-कभी जिज्ञासा-वश भगवद्धाम पहुँचने वाले कुछ भक्तों का पृथ्वी के ऊपर के उच्चतर लोकों के ऐश्वर्य के प्रति कुछ आकर्षण होता है, अतएव सिद्धि प्राप्त करते समय वे उन्हें देखने की इच्छा करते हैं। किन्तु वृष्णियों तथा भोजों को सीधे ही वहाँ भेज दिया गया, क्योंकि उन्हें भौतिक लोकों के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर भी सुझाव देते है कि अमरकोश के अनुसार आकृति का अर्थ ‘संकेत” भी है। भगवान् कृष्ण ने अपने प्रयाण के पश्चात् संकेत द्वारा उद्धव को बदरिकाश्रम जाने का आदेश दिया और शुद्ध भक्त होने से उद्धव ने भगवद्धाम वापस जाने की अपेक्षा अधिक श्रद्धापूर्वक उस आदेश का पालन किया। पृथ्वी के धरातल से भगवान् के प्रयाण के बाद भी उनके अकेले रहते जाने का यही कारण था।

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥