श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
श्री शुक उवाच
ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छित: ।
संहृत्य स्वकुलं स्फीतं त्यक्ष्यन्देहमचिन्तयत् ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ब्रह्म-शाप—ब्रह्मणों द्वारा शाप दिया जाना; अपदेशेन—बहाने से; कालेन— नित्य काल द्वारा; अमोघ—अचूक; वाञ्छित:—ऐसा चाहने वाला; संहृत्य—बन्द करके; स्व-कुलम्—अपने परिवार को; स्फीतम्—असंख्य; त्यक्ष्यन्—त्यागने के बाद; देहम्—विश्व रूप को; अचिन्तयत्—अपने आप में सोचा ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया : हे प्रिय राजन्, ब्राह्मण का शाप तो केवल एक बहाना था, किन्तु वास्तविक तथ्य तो भगवान् की परम इच्छा थी। वे अपने असंख्य पारिवारिक सदस्यों को भेज देने के बाद पृथ्वी के धरातल से अन्तर्धान हो जाना चाहते थे। उन्होंने अपने आप इस तरह सोचा।
 
तात्पर्य
 इस श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा अपना शरीर परित्याग करने के सम्बन्ध में त्यक्ष्यन् शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। चूँकि वे सच्चिदानन्द विग्रह हैं, अत: उनका शरीर तथा उनकी आत्मा अभिन्न हैं। अतएव यह कैसे सम्भव हो सकता है कि वे अपना शरीर त्यागें और तब इस जगत की दृष्टि से ओझल हों? भगवान् के रहस्यमय तिरोधान के विषय में अभक्तों या मायावादियों के बीच अत्यधिक विवाद है और अल्पज्ञों की शंकाओं को श्रील जीव गोस्वामी ने अपने कृष्ण सन्दर्भ में विस्तार से स्पष्ट किया है।

ब्रह्म-संहिता के अनुसार भगवान् के अनेक स्वरूप हैं। उसमें कहा गया है कि भगवान् के असंख्य रूप हैं और जब वे जीवों की दृष्टि के अन्तर्गत प्रकट होते हैं जैसाकि भगवान् कृष्ण वास्तव में प्रकट हुए, तो ये सारे स्वरूप उनमें मिल जाते हैं। इन अच्युत रूपों के अतिरिक्त उनका विश्वरूप है, जिसे उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन के समक्ष प्रकट किया। इस श्लोक में स्फीतम् शब्द भी प्रयुक्त हुआ है, जो यह संकेत करता है कि उन्होंने अपने विराट् रूप का परित्याग किया, अपने आदि नित्य रूप का नहीं, क्योंकि उनके सच्चिदानन्द स्वरूप के बदलने की कोई सम्भावना नहीं है। भगवान् के भक्तगण इस सरल ज्ञान से तुरन्त अवगत हो जाते हैं, किन्तु जो अभक्त हैं और भगवान् की कोई भक्ति भक्तिमय सेवा नहीं करते, वे या तो इस सरल तथ्य को समझते नहीं या जान बूझकर भगवान् के दिव्य शरीर की नित्यता को झुठलाने के लिए विवाद खड़ा करते हैं। यह उस दोष के कारण है, जिसे अपूर्ण जीवों को ठगने की प्रवृति कहते हैं।

व्यावहारिक अनुभव से भी आज तक यह देखा जाता है कि भगवान् के दिव्य स्वरूप की पूजा भक्तों द्वारा विभिन्न मन्दिरों में की जाती है और भगवान् के सारे भक्त यथार्थ के रूप में अनुभव करते हैं कि मन्दिर में अर्चाविग्रह का स्वरूप भगवान् के स्वरूप से अभिन्न है। भगवान् की अन्तरंगा शक्ति के इस अचिन्त्य कार्य का वर्णन भगवद्गीता (७.२५) में किया गया है—नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:। भगवान् को यह अधिकार है कि वे सबों के समक्ष प्रकट न हों। पद्म पुराण में कहा गया है—अत: श्रीकृष्ण नामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियै:। भगवान् का नाम तथा रूप भौतिक इन्द्रियों द्वारा अनुभव नहीं किया जा सकता। किन्तु जब वे संसारी लोगों को दृष्टिगोचर होते हैं, तो वे विराट् रूप धारण कर लेते हैं। यह स्वरूप का अतिरिक्त भौतिक प्रदर्शन है और विशेष्य तथा इसके विशेषणों के तर्क द्वारा मान्य है। व्याकरण में जब किसी विशेषण का विशेष्य अलग कर दिया जाता है, तो इसके द्वारा विशेषित विशेष्य बदलता नहीं। इसी तरह जब भगवान् अपना विराट् रूप त्यागते हैं, तो उनका नित्य रूप बदलता नहीं, यद्यपि उनमें तथा उनके असंख्य रूपों में से किसी एक में कोई अन्तर नहीं है। पंचम स्कन्ध में यह देखने को मिलेगा कि किस तरह विभिन्न लोकों में अब भी भगवान् की पूजा विभिन्न रूपों में की जाती है और इस पृथ्वी पर भी विभिन्न मन्दिरों में किस तरह उनकी पूजा की जाती है।

श्रील जीव गोस्वामी तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अपनी टीकाओं में वैदिक साहित्य के विभिन्न प्रामाणिक संस्करणों से उद्धरण देते हुए भगवान् के तिरोधान की इस घटना की विस्तृत व्याख्या दी है। इस ग्रन्थ की आकार-वृद्धि के भय से हम जानबूझकर उन सबों को यहाँ समाविष्ट नहीं कर रहे हैं। यह सारा प्रसंग भगवद्गीता में विवेचित है जैसाकि ऊपर उद्धरण दिया गया है; भगवान् को अधिकार है कि वे हर एक के समक्ष प्रकट न हों। वे उन अभक्तों की दृष्टि से, जो प्रेम तथा भक्ति से विहीन हैं, अपने को सदैव दूर रखते हैं और इस तरह उन्हें अपने से अधिकाधिक दूर करते जाते हैं। ब्रह्मा के अनुरोध पर भगवान् प्रकट हुए थे, क्योंकि उन्होंने क्षीरोदकशायी विष्णु के समक्ष प्रार्थना की थी, अतएव जब भगवान् प्रकट हुए तो विष्णु के सारे रूप उन्हीं में मिल गये और जब उद्देश्य पूरा हो गया तो वे यथासमय उनसे विलग हो गये।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥