श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नार्दित: प्रभु: ।
अतो मद्वयुनं लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
न—नहीं; उद्धव:—उद्धव; अणु—रंचभर; अपि—भी; मत्—मुझसे; न्यून:—घटकर; यत्—क्योंकि; गुणै:—प्रकृति के गुणों के द्वारा; न—न तो; अर्दित:—प्रभावित; प्रभु:—स्वामी; अत:—इसलिए; मत्-वयुनम्—मेरा (भगवान् का) ज्ञान; लोकम्— संसार; ग्राहयन्—प्रसार करने के लिए; इह—इस संसार में; तिष्ठतु—रहता रहे ।.
 
अनुवाद
 
 उद्धव किसी भी तरह मुझसे घटकर नहीं है, क्योंकि वह प्रकृति के गुणों द्वारा कभी भी प्रभावित नहीं हुआ है। अतएव भगवान् के विशिष्ट ज्ञान का प्रसार करने के लिए वह इस जगत में रहता रहे।
 
तात्पर्य
 भगवान् का प्रतिनिधि बनने के लिए जिस विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता होती है, वह है : प्रकृति के गुणों से अप्रभावित रहना। भौतिक जगत में मनुष्य की सर्वोच्च योग्यता ब्राह्मण बनना है। किन्तु, चूँकि ब्राह्मण सतोगुणी होता है, अत: ब्राह्मण होना ही भगवान् का प्रतिनिधि बनने के लिए पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को सतोगुण को भी लाँघ कर शुद्ध सत्त्व में स्थित होना पड़ता है, जो प्रकृति के किसी भी गुण से प्रभावित नहीं होता है। दिव्य योग्यता की यह अवस्था शुद्ध सत्त्व या वसुदेव कहलाती है और इस अवस्था में ईश-विज्ञान की अनुभूति की जा सकती है। जिस तरह भगवान् प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होते उसी तरह भगवान् का शुद्ध भक्त भी प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होता। भगवान् से तादात्म्य होने की यह प्राथमिक योग्यता है। जो व्यक्ति इस दिव्य योग्यता को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन्मुक्त कहलाता है, यद्यपि वह भौतिक अवस्था में रहता है। यह मुक्ति उसे प्राप्त होती है, जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर लगा रहता है। भक्तिरसामृत-सिन्धु (१.२.१८७) में कहा गया है—

ईहा यस्य हरेर्दास्ये कर्मणा मनसा गिरा।

निखिलास्वप्यवस्थासु जीवन्मुक्त: स उच्यते ॥

“जो कोई भी अपने कार्यों, मन तथा वाणी से एकमात्र भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति के लिए जीता है, वह निश्चय ही मुक्तात्मा है, भले ही वह इस जगत की भौतिक संसार की अवस्था में प्रतीत होता हो।” उद्धव ऐसे ही दिव्य पद को प्राप्त थे, इसीलिए उन्हें इस जगत की दृष्टि से भगवान् की शारीरिक अनुपस्थिति में भगवान् का वास्तविक प्रतिनिधि चुना गया था। ऐसा भगवद्भक्त भौतिक शक्ति, बुद्धि या वैराग्य से भी कभी प्रभावित नहीं होता। भगवान् का ऐसा भक्त भौतिक प्रकृति के समस्त आघातों को सह सकता है और इसीलिए वह गोस्वामी कहलाता है। ऐसे गोस्वामी ही भगवान् के दिव्य प्रेममय सम्बन्धों के रहस्यों का भेदन कर सकते हैं।

 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥