श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
एवं त्रिलोकगुरुणा सन्दिष्ट: शब्दयोनिना ।
बदर्याश्रममासाद्य हरिमीजे समाधिना ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
एवम्—इस तरह; त्रि-लोक—तीनों जगत के; गुरुणा—गुरु द्वारा; सन्दिष्ट:—ठीक से शिक्षा दी जाकर; शब्द-योनिना—जो समस्त वैदिक ज्ञान का स्रोत है उसके द्वारा; बदर्याश्रमम्—बदरिकाश्रम के तीर्थस्थान में; आसाद्य—पहुँचकर; हरिम्—भगवान् को; ईजे—तुष्ट किया; समाधिना—समाधि द्वारा ।.
 
अनुवाद
 
 शुकदेव गोस्वामी ने राजा को सूचित किया कि इस तरह समस्त वैदिक ज्ञान के स्रोत और तीनों लोकों के गुरु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा उपदेश दिये जाने पर उद्धव बदरिकाश्रम तीर्थस्थल पहुँचे और भगवान् को तुष्ट करने के लिए उन्होंने अपने को समाधि में लगा दिया।
 
तात्पर्य
 वस्तुत: भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोकों के गुरु हैं और वे समस्त वैदिक ज्ञान के आदि उद्गम हैं। किन्तु परम सत्य के साकार रूप को वेदों के द्वारा भी समझ पाना अत्यन्त कठिन है। परम सत्य के रूप में भगवान् को समझ पाने के लिए उनके निजी उपदेशों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे दिव्य ज्ञान का प्रमाण सार रूप में भगवद्गीता है। परमेश्वर को कोई तब तक नहीं जान सकता जब तक भगवान् स्वयं कृपा न करें। भगवान् कृष्ण ने यह विशेष कृपा अर्जुन तथा उद्धव पर प्रकट की जब वे इस भौतिक जगत में थे।
निस्सन्देह, भगवान् द्वारा भगवद्गीता का प्रवचन कुरुक्षेत्र युद्धस्थल में अर्जुन को युद्ध के प्रति प्रोत्साहित करने के लिए हुआ था। फिर भी भगवद्गीता के दिव्य ज्ञान को पूर्ण बनाने के लिए भगवान् ने उद्धव को उपदेश दिया। भगवान् की इच्छा थी कि उद्धव उनके मिशन को पूरा करें तथा जो ज्ञान भगवद्गीता में भी नहीं दिया गया उस ज्ञान का प्रसार करें। जो लोग वेदों के वचनों के प्रति आसक्त रहते हैं, वे भी इस श्लोक से यह जान सकते हैं कि भगवान् समस्त वैदिक ज्ञान के स्रोत हैं। जो व्यक्ति वेदों के पृष्ठों का अध्ययन करने के बाद भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ पाते वे भगवान् विषयक ज्ञान में आगे बढऩे के उद्देश्य से उद्धव जैसे किसी भगवद्भक्त की शरण ग्रहण कर सकते हैं। ब्रह्म-संहिता का कथन है कि वेदों से भगवान् को समझ पाना अत्यन्त कठिन है, किन्तु उद्धव जैसे शुद्ध भक्त से उन्हें आसानी से समझा जा सकता है। भगवान् ने बदरिकाश्रम में रहने वाले महर्षियों पर कृपा करके उद्धव को अपनी ओर से बोलने के लिए अधिकृत किया। ऐसा अधिकार प्राप्त किये बिना न तो कोई व्यक्ति भगवद्भक्ति को समझ सकता है न ही उसका उपदेश दे सकता है।

जब भगवान् इस धरा पर विद्यमान थे तो उन्होंने अन्तरिक्ष की भी यात्रा करके स्वर्ग से पारिजात लाने तथा अपने गुरु (सान्दीपनि मुनि) के पुत्र को यमलोक से वापस लाने जैसे बहुत से असामान्य कार्यकलाप सम्पन्न किये। उद्धव को निश्चित रूप से अन्य लोकों में जीवन की स्थितयों के विषय में बतलाया गया था और सारे ऋषि उन लोकों के बारे में जानने के लिए उसी तरह उत्सुक थे जिस तरह हम अन्तरिक्ष के ग्रहों के विषय में जानने के लिए उत्सुक रहते हैं। उद्धव को यह संदेश बदरिकाश्रम को ले जाने के लिए, न केवल उस तीर्थस्थल के ऋषियों के लिए, अपितु नर-नारायण अर्चाविग्रहों के लिए भी विशेष रूप से नियुक्त किया गया था। ऐसा सन्देश वेदों के पृष्ठों में वर्णित ज्ञान की अपेक्षा अधिक गुह्य रहा होगा।

भगवान् निस्सन्देह समस्त ज्ञान के स्रोत हैं और उद्धव के माध्यम से नर-नारायण तथा अन्य ऋषियों के पास भेजे गये सन्देश भी वैदिक ज्ञान के अंश थे, किन्तु वे अधिक गुह्य थे और वे एकमात्र उद्धव जैसे शुद्ध भक्त के माध्यम से ही भेजे या समझे जा सकते थे। चूँकि ऐसा गुह्य ज्ञान केवल भगवान् तथा उद्धव को ही ज्ञात था, अतएव यह कहा जाता है कि उद्धव स्वयं भगवान् के सदृश थे। उद्धव की ही तरह हरेक जीव भी भगवान् के ही स्तर पर दिव्य सन्देशवाहक बन सकता है बशर्ते कि वह प्रेमाभक्ति के द्वारा स्वयं विश्वस्त हो ले। ऐसा गुह्य ज्ञान उद्धव तथा अर्जुन जैसे शुद्ध भक्तों को ही सौंपा जाता है, जैसी कि भगवद्गीता में पुष्टि हुई है और मनुष्य को उन्हीं से यह रहस्य सीखना होता है, अन्य उपाय से नहीं। भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत को भगवान् के ऐसे विश्वस्त भक्तों की सहायता के बिना नहीं समझा जा सकता। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार वह गुह्य सन्देश अवश्य ही भगवान् के प्रयाण के रहस्य तथा इस लोक में उनके प्राकट्य के एक सौ वर्षों बाद उनके वंश के संहार के विषय में जानने से सम्बन्धित रहा होगा। हर व्यक्ति यदुवंश के संहार के रहस्य को जानने के लिए अतीव उत्सुक रहा होगा और वह संदेश भगवान् द्वारा उद्धव को बतलाया गया होगा तथा नर-नारायण एवं अन्य शुद्ध भगवद्भक्तों की जानकारी के लिए बदरिकाश्रम भेजा गया होगा।

 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥