श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
तथापि तदभिप्रेतं जानन्नहमरिन्दम ।
पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तु: पादविश्लेषणाक्षम: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
तथा अपि—तिस पर भी; तत्-अभिप्रेतम्—उनकी इच्छा; जानन्—जानते हुए; अहम्—मैं; अरिम्-दम—हे शत्रुओं के दमनकर्ता (विदुर); पृष्ठत:—पीछे; अन्वगमम्—अनुसरण किया; भर्तु:—स्वामी का; पाद-विश्लेषण—उनके चरणकमलों से बिलगाव; अक्षम:—समर्थ न होकर ।.
 
अनुवाद
 
 हे अरिन्दम (विदुर), (वंश का विनाश करने की) उनकी इच्छा जानते हुए भी मैं उनका अनुसरण करता रहा, क्योंकि अपने स्वामी के चरणकमलों के बिछोह को सह पाना मेरे लिए सम्भव न था।
 
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥