श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 4: विदुर का मैत्रेय के पास जाना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
तस्मिन्महाभागवतो द्वैपायनसुहृत्सखा ।
लोकाननुचरन् सिद्ध आससाद यद‍ृच्छया ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
तस्मिन्—तब; महा-भागवत:—भगवान् का महान् भक्त; द्वैपायन—कृष्ण द्वैपायन व्यास का; सुहृत्—हितैषी; सखा—मित्र; लोकान्—तीनों लोकों में; अनुचरन्—विचरण करते हुए; सिद्धे—उस आश्रम में; आससाद—पहुँचा; यदृच्छया—अपनी पूर्ण इच्छा से ।.
 
अनुवाद
 
 उसी समय संसार के अनेक भागों की यात्रा करके महान् भगवद्भक्त तथा महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास के मित्र एवं हितैषी मैत्रेय अपनी इच्छा से उस स्थान पर आ पहुँचे।
 
तात्पर्य
 मैत्रेय व्यासदेव के पिता महर्षि पराशर के शिष्यों में से थे। इस तरह व्यासदेव तथा मैत्रेय परस्पर मित्र तथा हितैषी थे। सौभाग्यवश मैत्रेय उस स्थान पर पहुँचे जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण विश्राम कर रहे थे। भगवान् से भेंट होना कोई सामान्य घटना नहीं है। मैत्रेय एक महर्षि तथा विद्वान् दार्शनिक थे, किन्तु शुद्ध भगवद्भक्त नहीं थे, अतएव उस समय भगवान् से उनकी भेंट किसी अज्ञात सुकृति अर्थात् अज्ञात भक्ति के कारण हुई होगी। शुद्ध भक्त सदैव शुद्ध भक्तिमय सेवा में लगे रहते हैं, अतएव भगवान् से उनकी भेंट स्वाभाविक है। किन्तु जब भगवान् से ऐसे लोग मिलते हैं, जो उस उचित स्तर पर नहीं होते, तो यह भेंट आकस्मिक भक्ति के अदृश्य भाग्य के कारण होती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥