श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
परावरेषां भगवन् व्रतानि
श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् ।
अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां
तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
पर—उच्चतर; अवरेषाम्—इन निम्नतरों का; भगवन्—हे प्रभु, हे महात्मन्; व्रतानि—वृत्तियाँ, पेशे; श्रुतानि—सुना हुआ; मे— मेरे द्वारा; व्यास—व्यास के; मुखात्—मुँह से; अभीक्ष्णम्—बारम्बार; अतृप्नुम—मैं तुष्ट हूँ; क्षुल्ल—अल्प; सुख-आवहानाम्— सुख लाने वाला; तेषाम्—उनमें से; ऋते—बिना; कृष्ण-कथा—भगवान् कृष्ण विषयक बातें; अमृत-ओघात्—अमृत से ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, मैं व्यासदेव के मुख से मानव समाज के इन उच्चतर तथा निम्नतर पदों के विषय में बारम्बार सुन चुका हूँ और मैं इन कम महत्व वाले विषयों तथा उनके सुखों से पूर्णतया तृप्त हूँ। पर वे विषय बिना कृष्ण विषयक कथाओं के अमृत से मुझे तुष्ट नहीं कर सके।
 
तात्पर्य
 चूँकि लोग सामाजिक तथा ऐतिहासिक प्रस्तुतियों को सुनने में अत्यधिक रुचि लेते हैं, अतएव श्रील व्यासदेव ने पुराण तथा महाभारत जैसे अनेक ग्रन्थों की रचना की है। ये ग्रन्थ सामान्यजनों के लिए पठनीय सामग्री हैं और इनकी रचना उनमें उस ईशचेतना को जागृत करने के लिए की गई थी जिसे लोग भौतिक जगत के बद्धजीवन में अब भूल चुके हैं। ऐसे ग्रन्थों का असली प्रयोजन उतना ऐतिहासिक सन्दर्भों की कथाएँ प्रस्तुत करना नहीं है जितना कि लोगों में ईशभावनामृत को जागृत करना है। उदाहरणार्थ, महाभारत कुरुक्षेत्र के युद्ध का इतिहास है और सामान्यजन इसे पढ़ते हैं, क्योंकि यह मानव समाज विषयक सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं की कथाओं से भरापड़ा है। किन्तु वास्तव में महाभारत का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग भगवद्गीता है, जिसे कुरुक्षेत्र के युद्ध के ऐतिहासिक वर्णनों के साथ-साथ पाठकों को स्वत: पढ़ा दिया जाता है।

विदुर ने मैत्रेय को बताया कि वे लौकिक, सामाजिक तथा राजनीतिक कथाओं के ज्ञान से पूर्णतया तृप्त हो चुके हैं, अतएव अब उनमें उनके लिए रुचि नहीं है। वे भगवान् कृष्ण विषयक दिव्य कथाएँ सुनने के लिए लालायित थे। चूँकि पुराणों, महाभारत इत्यादि में कृष्ण से सीधा सम्बन्ध रखने वाली कथाएँ अपर्याप्त थीं, अतएव वे तुष्ट न हो सके और कृष्ण के बारे में और अधिक जानना चाह रहे थे। कृष्णकथाएँ दिव्य हैं और ऐसी कथाओं के सुनने से तृप्ति नहीं होती। कृष्णकथा, अथवा कृष्ण के प्रवचन होने के कारण भगवद्गीता महत्त्वपूर्ण है। कुरुक्षेत्र के युद्ध की कहानी आम जनता के लिए रोचक हो सकती है, किन्तु भगवद्भक्ति में अत्यधिक आगे बढ़ चुके विदुर जैसे व्यक्ति के लिए कृष्णकथा तथा कृष्णकथा से जुड़ी कथा ही रोचक है। विदुर मैत्रेय के मुख से सारी बातें सुनना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने उनसे पूछा, किन्तु उन्होंने इच्छा प्रकट की कि ये सारी कथाएँ कृष्ण के सम्बन्ध में हों। जिस तरह अग्नि कितना भी ईंधन जला डाले कभी तुष्ट नहीं होती उसी तरह शुद्ध भगवद्भक्त कृष्ण के विषय में जितना सुनता है, वह कम ही होता है। ऐतिहासिक घटनाएँ तथा अन्य सामाजिक एवं राजनीतिक बातें कृष्ण से सम्बन्धित होते ही दिव्य बन जाती हैं। लेकिन सांसारिक बातों को आध्यात्मिक रूप में बदलने का यही तरीका है। यह सारा जगत वैकुण्ठ में परिणत हो जाय यदि सारे सांसारिक कार्य कृष्णकथा से जुड़ जायें।

संसार में दो महत्त्वपूर्ण कृष्ण कथाएँ प्रचलित हैं—भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत। भगवद्गीता कृष्णकथा है, क्योंकि इसे कृष्ण ने कहा है, जबकि श्रीमद्भागवत इसलिए कृष्णकथा है, क्योंकि इसमें कृष्ण के विषय में कहा गया है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सारे शिष्यों से संसार भर में बिना भेदभाव के कृष्णकथा का प्रचार करने के लिए कहा, क्योंकि कृष्णकथा की दिव्य शक्ति हर एक को भौतिक कल्मष से शुद्ध बना सकती है।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥