श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक
कस्तृप्नुयात्तीर्थपदोऽभिधानात्
सत्रेषु व: सूरिभिरीड्यमानात् ।
य: कर्णनाडीं पुरुषस्य यातो
भवप्रदां गेहरतिं छिनत्ति ॥ ११ ॥
 
शब्दार्थ
क:—वह कौन मनुष्य है; तृप्नुयात्—जो तुष्ट किया जा सके; तीर्थ-पद:—जिसके चरणकमल तीर्थस्थल हैं; अभिधानात्—की बातों से; सत्रेषु—मानव समाज में; व:—जो है; सूरिभि:—महान् भक्तों द्वारा; ईड्यमानात्—इस तरह पूजित होने वाला; य:— जो; कर्ण-नाडीम्—कानों के छेदों में; पुरुषस्य—मनुष्य के; यात:—प्रवेश करते हुए; भव-प्रदाम्—जन्म-मृत्यु प्रदान करने वाला; गेह-रतिम्—पारिवारिक स्नेह; छिनत्ति—काट देता है ।.
 
अनुवाद
 
 जिनके चरणकमल समस्त तीर्थों के सार रूप हैं तथा जिनकी आराधना महर्षियों तथा भक्तों द्वारा की जाती है, ऐसे भगवान् के विषय में पर्याप्त श्रवण किये बिना मानव समाज में ऐसा कौन होगा जो तुष्ट होता हो? मनुष्य के कानों के छेदों में ऐसी कथाएँ प्रविष्ट होकर उसके पारिवारिक मोह के बन्धन को काट देती हैं।
 
तात्पर्य
 कृष्णकथा इतनी शक्तिशाली होती है कि मनुष्य के कान में प्रवेश करने मात्र से पारिवारिक स्नेह के बन्धन से उसका उद्धार तुरन्त कर सकती है। पारिवारिक स्नेह बहिरंगा शक्ति की भ्रामक अभिव्यक्ति है और समस्त लौकिक कार्यकलापों की यही एकमात्र प्रेरक है। जब तक लौकिक क्रियाशीलता रहती है और मन ऐसे कार्य में लीन रहता है तब तक चालू भौतिक अज्ञानता में बारम्बार जन्म-मृत्यु को भोगना पड़ता है। लोग भौतिक प्रकृति के तमोगुण से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं और कुछ लोग रजोगुण से प्रभावित होते हैं और इन दो गुणों के बन्धन में जीव देहात्मबुद्धि द्वारा गतिशील होता है। लौकिक गुण जीव को अपनी सही स्थिति को समझने नहीं देते। तमो तथा रजो दोनों ही गुण मनुष्य को मोहमयी देहात्मबुद्धि से जकड़ देते हैं। इस तरह से भ्रमित हुए लोगों में से सबसे बड़े मूर्ख वे होते हैं, जो रजोगुण के प्रभाव में आकर परोपकारी कार्यों में संलग्न होते हैं। भगवद्गीता जो प्रत्यक्ष कृष्णकथा है, मानवता को यह मूलभूत पाठ पढ़ाती है कि शरीर नाशवान है और सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त चेतना अनश्वर है। चेतन जीव अर्थात् अविनश्वर आत्मा, शाश्वत विद्यमान रहता है और शरीर के विघटन के बाद भी किसी भी तरह मारा नहीं जा सकता। जो कोई भी इस नश्वर शरीर को आत्मा समझता है और समाज शास्त्र, राजनीति, परोपकार, परार्थवाद, राष्ट्रीयता या अन्तर्राष्ट्रीयता के नाम पर देहात्मबुद्धि की दुहाई देकर काम करता है, वह निश्चय ही मूर्ख है और वास्तविकता (सत्) तथा अवास्तविकता (असत्) की जटिलताओं को नहीं जानता। इनमें से कुछ तमो तथा रजो गुणों से ऊपर होते हैं और सतोगुण में स्थित होते हैं, किन्तु लौकिक सत्त्व सदैव तमो तथा रजो गुणों से कलुषित रहता है। लौकिक सत्त्व मनुष्य को यह समझा सकता है कि शरीर तथा आत्मा भिन्न हैं और जो सतोगुणी है, वह आत्मा की परवाह करता है, शरीर की नहीं। किन्तु कलुषित होने से लौकिक सतोगुणी लोग व्यक्ति के रूप में आत्मा के असली स्वभाव को नहीं समझ सकते। उनकी शरीर से पृथक् आत्मा विषयक निर्विशेष धारणा उन्हें भौतिक प्रकृति के अन्तर्गत सतोगुण में रखती है और जब तक वे कृष्णकथा के प्रति आकृष्ट नहीं होते तब तक वे भवबन्धन से कभी भी मोक्ष नहीं पा सकते। कृष्णकथा संसार के सभी लोगों के लिए एकमात्र ओषधि है, क्योंकि यह मनुष्य को आत्मा की शुद्ध चेतना में स्थित कर सकती है और उसे भवबन्धन से मुक्त कर सकती है। श्री चैतन्य महाप्रभु की संस्तुति के अनुसार विश्वभर में कृष्णकथा का प्रचार करना सबसे बड़ा धर्मोपदेश कार्य है और संसार के समस्त विवेकवान नर-नारी श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा चलाये गये इस महान् आन्दोलन में सम्मिलित हो सकते हैं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥