श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक
मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां
सखापि ते भारतमाह कृष्ण: ।
यस्मिन्नृणां ग्राम्यसुखानुवादै-
र्मतिर्गृहीता नु हरे: कथायाम् ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
मुनि:—मुनि ने; विवक्षु:—वर्णन किया; भगवत्—भगवान् के; गुणानाम्—दिव्य गुणों का; सखा—मित्र; अपि—भी; ते— तुम्हारा; भारतम्—महाभारत; आह—वर्णन किया है; कृष्ण:—कृष्ण-द्वैपायन व्यास; यस्मिन्—जिसमें; नृणाम्—मनुष्यों के; ग्राम्य—सांसारिक; सुख-अनुवादै:—लौकिक कथाओं से प्राप्य आनन्द; मति:—ध्यान; गृहीता नु—अपनी ओर खींचने के लिए; हरे:—भगवान् की; कथायाम्—भाषणों का (भगवद्गीता) ।.
 
अनुवाद
 
 आपके मित्र महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास पहले ही अपने महान् ग्रन्थ महाभारत में भगवान् के दिव्य गुणों का वर्णन कर चुके हैं। किन्तु इसका सारा उद्देश्य सामान्य जन का ध्यान लौकिक कथाओं को सुनने के प्रति उनके प्रबल आकर्षण के माध्यम से कृष्णकथा (भगवद्गीता) की ओर आकृष्ट करना है।
 
तात्पर्य
 महर्षि कृष्णद्वैपायन व्यास समस्त वैदिक वाङ्मय के रचयिता हैं जिसमें से वेदान्त सूत्र, श्रीमद्भागवत तथा महाभारत नामक कृतियाँ अत्यन्त लोकप्रिय हैं। जैसाकि भागवत (१.४.२५) में कहा गया है श्रील व्यासदेव ने महाभारत की रचना उन अल्प बुद्धिवाले मनुष्यों के लिए की जो जीवन के दर्शन की अपेक्षा लौकिक कथाओं में अधिक रुचि लेते हैं। वेदान्त सूत्र की रचना ऐसे व्यक्तियों के लिए की गई थी जो पहले से लौकिक कथाओं से ऊपर हों और जिन्होंने लौकिक कार्यकलापों के तथाकथित सुख की कटुता का पहले से आस्वादन किया हो। वेदान्त सूत्र का पहला सूत्र है अथातो ब्रह्मजिज्ञासा अर्थात् जब किसी ने इन्द्रियतृप्ति के बाजार में लौकिक जिज्ञासाओं का सौदा पूरा कर लिया हो तभी वह ब्रह्म के विषय में प्रासंगिक जिज्ञासाएँ कर सकता है। जो लोग ऐसी लौकिक जिज्ञासाओं में व्यस्त रहते हैं जिनसे समाचारपत्र तथा अन्य ऐसे ग्रंथ भरे रहते हैं, वे स्त्रीशूद्रद्विजबन्धु अर्थात् स्त्रियों, श्रमिकों तथा उच्च जाति (ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य) के अयोग्य पुत्रों की श्रेणी में आते हैं। ऐसे अल्पज्ञ लोग वेदान्त सूत्र के प्रयोजन को नहीं समझ सकते यद्यपि वे विकृत रूप में सूत्रों का अध्ययन करने का स्वांग कर सकते हैं। वेदान्त सूत्र के असली प्रयोजन की व्याख्या प्रणेता ने स्वयं श्रीमद्भागवत में की है और श्रीमद्भागवत के सन्दर्भ के बिना वेदान्त सूत्र को समझने का प्रयास करने वाला कोई भी व्यक्ति निश्चय ही दिग्भ्रमित हो जाता है। ऐसे दिग्भ्रमित लोगों को जो शरीर को आत्मा समझने की गलत धारणा के अधीन, लौकिक परोपकारी कार्यों में रुचि दिखाते हैं, महाभारत से लाभ उठाना चाहिए जिसे श्रीव्यासदेव ने विशेष रूप से उन्हीं के लाभार्थ लिखा है। इस महान् प्रणेता ने महाभारत की रचना इस प्रकार की है कि ऐसे अल्पज्ञ लोग, जिन्हें लौकिक कथाओं में अधिक रूचि है, बड़े चाव से महाभारत को पढ़ सकते हैं और ऐसे लौकिक सुख के दौरान वे भगवद्गीता का भी लाभ उठा सकते हैं, जो कि श्रीमद्भागवत या वेदान्त सूत्र का प्रारम्भिक अध्ययन है। श्रील व्यासदेव द्वारा लौकिक कार्यकलापों का इतिहास लिखने में, अल्पज्ञों के लिए भगवद्गीता के माध्यम से दिव्य साक्षात्कार का अवसर प्रदान करने के अतिरिक्त, कोई अन्य प्रयोजन न था। विदुर द्वारा महाभारत का संदर्भ सूचित करता है कि उन्होंने अपने असली पिता व्यासदेव से महाभारत सुनी जब वे घर से दूर रहकर तीर्थ स्थलों का भ्रमण कर रहे थे।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥