श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
तदस्य कौषारव शर्मदातु-
र्हरे: कथामेव कथासु सारम् ।
उद्‍धृत्य पुष्पेभ्य इवार्तबन्धो
शिवाय न: कीर्तय तीर्थकीर्ते: ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—इसलिए; अस्य—उसका; कौषारव—हे मैत्रेय; शर्म-दातु:—सौभाग्य प्रदान करने वाले; हरे:—भगवान् की; कथाम्— कथाएँ; एव—एकमात्र; कथासु—सभी कथाओं में; सारम्—सार; उद्धृत्य—उद्धरण देकर; पुष्पेभ्य:—फूलों से; इव—सदृश; आर्त-बन्धो—हे दुखियों के बन्धु; शिवाय—कल्याण के लिए; न:—हमारे; कीर्तय—कृपया वर्णन कीजिये; तीर्थ—तीर्थयात्रा; कीर्ते:—कीर्तिवान को ।.
 
अनुवाद
 
 हे मैत्रेय, हे दुखियारों के मित्र, एकमात्र भगवान् की महिमा सारे जगत के लोगों का कल्याण करने वाली है। अतएव जिस तरह मधुमक्खियाँ फूलों से मधु एकत्र करती हैं, उसी तरह कृपया समस्त कथाओं के सार—कृष्णकथा—का वर्णन कीजिये।
 
तात्पर्य
 विभिन्न भौतिक गुणों वाले भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए अनेक प्रकार की कथाएँ होती हैं, किन्तु सबसे आवश्यक कथाएँ वे हैं, जो भगवान् से सम्बन्धित होती हैं। दुर्भाग्यवश, भौतिक रूप से प्रभावित बद्धजीव भगवान् की कथाओं के प्रति न्यूनाधिक विमुख रहते हैं, क्योंकि इनमें से कुछ लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं रखते और कुछ ईश्वर के केवल निर्विशेष रूप में ही विश्वास करते हैं। दोनों ही दशाओं में उनके लिए ईश्वर के विषय में कुछ भी नहीं कहना होता। विश्वास न करने वाले तथा निर्विशेषवादी दोनों ही समस्त कथाओं के सार से इनकार करते हैं, अतएव वे या तो इन्द्रियतृप्ति विषयक कथाओं में या मानसिक चिन्तन में अपने को लगाते हैं। विदुर जैसे शुद्ध भक्तों के लिए संसारी लोगों तथा मानसिक चिन्तकों, दोनों ही की कथाएँ सभी तरह से व्यर्थ हैं। अत: विदुर ने मैत्रेय से केवल सार, अर्थात् कृष्णकथा के विषय में बातें करने की प्रार्थना की, अन्य किसी विषय पर नहीं।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥