श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
साधु पृष्टं त्वया साधो लोकान् साध्वनुगृह्णता ।
कीर्तिं वितन्वता लोके आत्मनोऽधोक्षजात्मन: ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—श्री मैत्रेय ने कहा; साधु—सर्वमंगलमय; पृष्टम्—पूछा गया; त्वया—तुम्हारे द्वारा; साधो—हे भद्रे; लोकान्— सारे लोग; साधु अनुगृह्णता—अच्छाई में दया का प्रदर्शन; कीर्तिम्—कीर्ति; वितन्वता—प्रसार करते हुए; लोके—संसार में; आत्मन:—आत्मा का; अधोक्षज—ब्रह्म; आत्मन:—मन ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीमैत्रेय ने कहा : हे विदुर, तुम्हारी जय हो। तुमने मुझसे सबसे अच्छी बात पूछी है। इस तरह तुमने संसार पर तथा मुझ पर अपनी कृपा प्रदर्शित की है, क्योंकि तुम्हारा मन सदैव ब्रह्म के विचारों में लीन रहता है।
 
तात्पर्य
 ब्रह्म विज्ञान में अनुभवी मैत्रेय मुनि समझ गये कि विदुर का मन पूर्णतया ब्रह्म में लीन है। अधोक्षज का अर्थ है, जो इन्द्रिय अनुभूति या इन्द्रिय अनुभव की सीमाओं को लाँघ जाता है। भगवान् हमारे इन्द्रिय अनुभव के परे हैं, किन्तु वे निष्ठावान भक्त के समक्ष अपने को प्रकट करते हैं। चूँकि विदुर भगवान् के विचार में सदैव लीन रहते थे, अतएव मैत्रेय विदुर के दिव्य महत्त्व का अनुमान लगा सके। उन्होंने विदुर के मूल्यवान प्रश्नों को सराहा और अत्यन्त आदर के साथ उन्हें धन्यवाद दिया।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥